֍:बीज§ֆ:किसी भी फसल की खेती करने के लिए बीज का गुणवत्तापूर्ण होने आवश्यक है. इसके लिए ट्राइकोडर्मा विरिडी 10 ग्राम प्रति किलो और एजेटोबैक्टर और पीएसबी 600 ग्राम प्रति हेक्टेयर काम में लेना चाहिए. ट्राइकोडर्मा विरिडी 2.5 किलो को 100 किलो गोबर की खाद के साथ प्रति हेक्टेयर खेत में उपचारित करें. तुंबा की खल 1.5 टन और 3 टन गोबर की खाद और 3 टन सरसों की कंपोस्ट के साथ 250 किलो जिप्सम प्रति हेक्टेयर मिट्टी में देना चाहिए.§֍:बुवाई§ֆ:बीजोपचार करने के बाद बीज लगाने की तैयारी कर लें. एक हेक्टेयर क्षेत्र में 12 से 15 किलो बीज डाला जाता है. बुवाई से पहले 7.5 ग्राम इमिडाक्लोप्रिड 70 घुलनशील चूर्ण से प्रति किलो बीज को उपचारित करें. जीरे की बुवाई मध्य नवंबर के आसपास कर देनी चाहिए क्योंकि इसमें जितनी देर होगी, जीरे की उपज उतनी ही कम रह सकती है. इससे किसान की कमाई घटने की आशंका रहेगी. इसलिए अच्छी उपज और कमाई के लिए जरूरी है कि किसान मध्य नवंबर तक जीरे की बुवाई शुरु कर दें. इस फसल की बुवाई छिटकवां विधि से की जाती है. तैयार खेत में पहले क्यारियां बनाते हैं. उनमें बीजों को एक साथ छिटक कर क्यारियों में लोहे की दंताली इस प्रकार फिरा देनी चाहिए कि बीज के ऊपर मिट्टी की एक हल्की से परत चढ़ जाए. निराई-गुड़ाई और अन्य शस्य क्रियाओं की सुविधा की दृष्टि से छिटकवां विधि की अपेक्षा कतारों से बुवाई करना अधिक उपयुक्त पाया गया है. §भारत के घरों में लगभग हर दूसरी सब्जी में जीरा डाला जाता है. इसलिए जीरे की डिमांड पूरे देसभर में बनी रहती है. ये एक प्रकार का मसाला है जो खाने का स्वाद बढ़ा देता है. इसी के साथ इसके कई हेल्क बेनिफिट्स भी हैं. कई किसान जीरे की जैविक खेती भी कर रहे हैं, जिससे उन्हें बढ़िया उत्पाद के साथ बेहतर मुनाफा भी मिल सकेगा. ऐसे में आइए आपको बताते हैं कैसे शुरु कर सकते हैं जीरे की जैविक खेती…

