सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को भारतीय सेना के बारे में उनकी टिप्पणियों पर कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या उनके पास ठोस सबूत हैं जो यह साबित करते हैं कि “चीन ने भारत की जमीन हड़प ली है?” कोर्ट ने कहा कि ऐसी संवेदनशील स्थिति में सेना के बारे में बयानबाजी करना देशहित में नहीं है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने राहुल गांधी से पूछा, “जब सीमा पर विवाद चल रहा हो, तो क्या ऐसी बातें करनी चाहिए? अगर आप सच्चे भारतीय हैं, तो सेना के बारे में ऐसी टिप्पणियां नहीं करेंगे। आप संसद में यह मुद्दा क्यों नहीं उठाते?”
राहुल के वकील और सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने उनका पक्ष रखते हुए कहा कि “अगर नेता प्रतिपक्ष सवाल नहीं उठा सकते, तो उनकी भूमिका का क्या मतलब है?” इस पर कोर्ट ने जवाब दिया, “वे संसद में यह सवाल क्यों नहीं पूछते? सोशल मीडिया पर विवादास्पद बयान देने के बजाय संसदीय प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं करते?”
पूरा मामला क्या है?
यह विवाद 2022 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान शुरू हुआ, जब राहुल गांधी ने गलवान घाटी में भारत-चीन सीमा विवाद पर टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, “लोग भारत जोड़ो यात्रा के बारे में तो सवाल पूछेंगे, लेकिन चीनी सैनिकों द्वारा हमारे जवानों की पिटाई पर एक बार भी सवाल नहीं करेंगे?” साथ ही, उन्होंने यह भी दावा किया था कि “चीन ने भारतीय भूमि पर अवैध कब्जा कर लिया है।”
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
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कांग्रेस ने कहा कि राहुल गांधी ने देशहित में सवाल उठाए हैं और यह उनका संवैधानिक अधिकार है।
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भाजपा ने कोर्ट की टिप्पणियों का स्वागत करते हुए कहा कि “सेना की छवि खराब करने वाले बयानों पर अंकुश जरूरी है।”
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रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा मुद्दों पर बिना सबूत के बयान देना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने एक बार फिर राजनीतिक नेताओं के लिए संवेदनशील मुद्दों पर सावधानी बरतने की नसीहत दी है। राहुल गांधी के बयानों को लेकर यह मामला अब देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में इसके राजनीतिक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।

