बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग द्वारा शुरू किए गए वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर सियासी घमासान तेज़ हो गया है। इस अभियान के खिलाफ कई विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। गुरुवार को इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ में हो रही है।
विरोध की मुख्य वजह
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने कोर्ट को बताया कि यह विशेष पुनरीक्षण अभियान मौजूदा नियमों को दरकिनार करते हुए चलाया जा रहा है, जो पूरी प्रक्रिया को “भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक” बना देता है। उन्होंने यह भी कहा कि आयोग द्वारा 1 जनवरी 2003 के बाद मतदाता सूची में नाम जुड़वाने वाले लोगों से विशेष दस्तावेज़ की मांग की जा रही है, जो कि कानून के खिलाफ है।
चुनाव आयोग का पक्ष
इस मामले में चुनाव आयोग की ओर से पूर्व अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल कोर्ट में पेश हुए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि वह सभी याचिकाओं पर विचार नहीं करेगा, बल्कि केवल मौलिक मुद्दों पर ही सुनवाई की जाएगी।
राजनीतिक पृष्ठभूमि:
बिहार में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले वोटर लिस्ट को लेकर यह विवाद नए राजनीतिक तनाव को जन्म दे सकता है। विपक्ष को आशंका है कि इस विशेष पुनरीक्षण अभियान के जरिए बड़े पैमाने पर “चुनिंदा मतदाताओं” को सूची से बाहर किया जा सकता है, जिससे निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

