आज की फिल्मों में जहां ज़्यादातर कहानियाँ दर्शकों को रोमांच और शोरगुल के ज़रिए लुभाने की होड़ में लगी होती हैं, वहीं ‘सितारे ज़मीन पर’ एक सादगी भरा अपवाद बनकर सामने आती है। यह वह फिल्म है जो देखने के बाद आपके चेहरे पर एक शांत मुस्कान छोड़ जाती है और दिल में एक गहरा असर कर जाती है।
एक भावुक यात्रा की शुरुआत
फिल्म की कहानी गुलशन अरोड़ा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो दिल्ली की बास्केटबॉल टीम का असिस्टेंट कोच है। खेल की दुनिया में उसका हुनर काबिल-ए-तारीफ है, लेकिन इंसानियत के पैमाने पर वह अक्सर खुद से और अपने रिश्तों से भागता दिखाई देता है। न तो वह अपने पिता से मिले मानसिक घावों से उबर पाया है, न ही अपनी पत्नी सुनीता (जेनेलिया डी’सूज़ा) की भावनाओं को समझ पाया है।
हालात तब करवट लेते हैं जब एक कानूनी गलती के चलते कोर्ट उसे जेल नहीं, बल्कि बौद्धिक अक्षमता से जूझ रहे युवाओं की बास्केटबॉल टीम को कोचिंग देने की सज़ा सुनाता है। गुलशन इसे एक बोझ की तरह देखता है – न कि बदलाव के अवसर की तरह।
बदलते नजरिए की कहानीगुलशन की सबसे बड़ी कमी ये नहीं है कि वह ऑटिज्म या डाउन सिंड्रोम जैसी स्थितियों के बारे में नहीं जानता, बल्कि यह है कि वह इनसे पीड़ित लोगों को ‘सामान्य’ नहीं मानता। धीरे-धीरे जब वह इस खास टीम के साथ समय बिताता है, तो उसकी सोच और दृष्टिकोण में बदलाव आता है। कोच के रूप में शुरू हुई यह यात्रा उसे एक बेहतर इंसान बनने की राह दिखाती है।
आमिर खान का भरोसेमंद सिनेमा
आमिर खान हमेशा से सामाजिक और भावनात्मक मुद्दों को बड़े पर्दे पर ईमानदारी से पेश करने वाले कलाकार रहे हैं। इस फिल्म में वह सिर्फ अभिनेता नहीं बल्कि एक संवेदनशील कहानीकार के रूप में नज़र आते हैं। ‘सितारे ज़मीन पर’ इसी कड़ी में एक और मील का पत्थर है, जो यह भरोसा दिलाता है कि संवेदनशील और अर्थपूर्ण कहानियाँ आज भी दर्शकों के दिल को छू सकती हैं।

