पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (PAU), लुधियाना ने फलों की उन्नत किस्मों के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) द्वारा विश्वविद्यालय को “ग्वावा में बायोटेक्नोलॉजी आधारित प्रिसीजन और प्रेडिक्टिव ब्रीडिंग” विषय पर करीब 4 करोड़ रुपये की अनुसंधान परियोजना प्रदान की गई है।
यह परियोजना “पैंगीनोमिक्स और SNP एरे विकास” पर आधारित है, जिसके अंतर्गत अमरूद की गुणवत्ता और प्रोसेसिंग विशेषताओं को नियंत्रित करने वाले आनुवंशिक कारकों की पहचान की जाएगी। ‘ट्रॉपिक्स का सेब’ कहे जाने वाले अमरूद की पौष्टिकता, लंबी शेल्फ लाइफ, कम बीज और रंगीन गूदा जैसी विशेषताओं को विकसित करने के उद्देश्य से यह परियोजना शुरू की जा रही है।
इस अनुसंधान परियोजना का नेतृत्व कर रहे हैं डॉ. अमनदीप मित्तल (प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर और प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर-I) और डॉ. नरेश कुमार अरोड़ा (प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर-II)। उनके साथ डॉ. मानव इंद्र सिंह गिल, डॉ. प्रवीन छुनेजा, डॉ. इंदरजीत सिंह यादव, डॉ. राजबीर सिंह बोरा, डॉ. रिमलजीत कौर, डॉ. किरणदीप कौर कांग, डॉ. पवन कुमार मल्होत्रा और डॉ. दलजिंदर सिंह जैसे दस वैज्ञानिक इस अनुसंधान में सह-प्रधान अन्वेषक के रूप में जुड़े हुए हैं।
इस परियोजना के तहत:
- अमरूद की भारतीय किस्मों का पैनजीनोम विकसित किया जाएगा।
- अलाहाबाद सफेदा किस्म के जीनोम में सुधार किया जाएगा।
- SNP एरे विकसित करके हाई क्वालिटी हाइब्रिड किस्मों का चयन किया जाएगा।
- कम बीजों वाले, मुलायम बीज वाले, अधिक मीठे और एंथोसायनिन युक्त (गहरे रंग वाले) अमरूद के उन्नत किस्में तैयार की जाएंगी।
मार्कर असिस्टेड सिलेक्शन (MAS) के उपयोग से गुणवत्तापूर्ण किस्में विकसित करने में समय, संसाधन और लागत की बचत होगी, जिससे किसानों को व्यावसायिक लाभ मिलेगा।
इस बड़ी उपलब्धि पर PAU के कुलपति डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने अनुसंधान टीम को बधाई देते हुए इसे फलवर्गीय अनुसंधान के क्षेत्र में एक मील का पत्थर बताया। डॉ. अजमेर सिंह ढट्ट, निदेशक अनुसंधान, और डॉ. ऋषि पाल सिंह, रजिस्ट्रार ने वैज्ञानिकों को किसानों की समस्याओं के बायोटेक्नोलॉजिकल समाधान खोजने के लिए प्रेरित किया।
वहीं डॉ. योगेश विकल, निदेशक, स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल बायोटेक्नोलॉजी, तथा डॉ. एच.एस. रत्तनपाल, प्रमुख, फल विज्ञान विभाग ने इस उत्कृष्ट प्रयास की सराहना की और टीम को शुभकामनाएं दीं। यह परियोजना आने वाले वर्षों में अमरूद की गुणवत्ता और उत्पादकता में क्रांतिकारी बदलाव लाने में सहायक सिद्ध होगी।

