प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में 1975 में लगाए गए आपातकाल को लेकर एक विशेष प्रस्ताव पारित किया गया। प्रस्ताव में कहा गया कि आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की क्रूर हत्या हुई थी, जिसे देश कभी नहीं भूल सकता। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सभी केंद्रीय मंत्रियों ने लोकतंत्र के बलिदानियों को श्रद्धांजलि देते हुए दो मिनट का मौन रखा।
प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि 25 जून 1975 को देश में लगाए गए आपातकाल ने न केवल संविधान के मूल मूल्यों को दबाया, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों को भी कुचल दिया गया। मंत्रिमंडल ने इसे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक काला अध्याय करार दिया।
सरकार का सख्त संदेश
कैबिनेट के इस प्रस्ताव को राजनीतिक संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है, जो आने वाले दिनों में संसद और सार्वजनिक मंचों पर गूंज सकता है। भाजपा लंबे समय से आपातकाल के मुद्दे को कांग्रेस के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल करती रही है, और इस प्रस्ताव के जरिए उसने फिर से लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा का संकल्प दोहराया है।
लोकतंत्र के रक्षक को किया याद
प्रस्ताव में आपातकाल का विरोध करने वाले नेताओं, पत्रकारों, और सामाजिक कार्यकर्ताओं के योगदान को भी सराहा गया। सरकार ने कहा कि उनके साहस और संघर्ष से ही लोकतंत्र की बहाली संभव हो सकी।

