֍:ग्राम स्तर पर महिलाएं बनेंगी खेती की मार्गदर्शक§ֆ:कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. नवीन कुमार ने कहा कि अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग से भूमि की उर्वरता, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर खतरे उत्पन्न हो चुके हैं। उन्होंने कहा, “हमारी कृषि पद्धतियों को अब प्राकृतिक और जैविक दिशा में मोड़ना समय की मांग है।” डॉ. कुमार ने ‘कृषि सखी’ योजना को महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ खेती की नई क्रांति बताया। उन्होंने कहा कि इन प्रशिक्षित महिलाओं के माध्यम से गांव-गांव तक वैज्ञानिक खेती की तकनीकें पहुंचेंगी, जिससे न केवल उत्पादन सुधरेगा बल्कि किसानों की आय भी बढ़ेगी।
§֍:प्रशिक्षण में मिल रही आधुनिक जानकारी§ֆ:इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में बैजनाथ, भवारना, धर्मशाला, बड़ोह, लंबागांव व अन्य क्षेत्रों की महिलाएं भाग ले रही हैं। उन्हें प्राकृतिक खेती की तकनीकों, बीज उपचार, जीवामृत, घनजीवामृत, वर्मी कम्पोस्ट, मल्चिंग जैसी विषयों पर गहन जानकारी दी जा रही है।
प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ. विनोद शर्मा ने विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रशिक्षण में भाग लिया और महिला किसानों को इस पहल का सक्रिय हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित किया।कार्यक्रम निदेशक एवं नोडल अधिकारी डॉ. जनार्दन सिंह ने प्रशिक्षण की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि आने वाले समय में ये कृषि सखियां ग्रामीण किसानों की मार्गदर्शक और परामर्शदाता की भूमिका निभाएंगी।
§֍:जैविक गांवों की स्थापना§ֆ:समन्वयक डॉ. रामेश्वर कुमार, डॉ. गोपाल कतना और डॉ. राकेश चौहान ने प्रशिक्षण के तकनीकी सत्रों का संचालन किया और प्रतिभागियों को जमीनी स्तर की समस्याओं और उनके समाधान से अवगत कराया।इस कार्यक्रम का अंतिम उद्देश्य है राज्य में प्राकृतिक खेती को जड़ से स्थापित करना और हिमाचल को जैविक उत्पादों के क्षेत्र में अग्रणी बनाना।§हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले की महिलाएं अब प्राकृतिक खेती की दिशा में नई पहचान बनाने जा रही हैं। चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर ने भारत सरकार के राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत एक पांच दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत की है, जिसमें जिले के विभिन्न ब्लॉकों से चयनित 32 कृषि सखियों और सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों (सीआरपी) को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।इस पहल का मकसद है ग्रामीण स्तर पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना और किसानों को रसायन मुक्त, टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करना।

