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Home साक्षात्कार

इन तकनीकों से बढ़ाएं अरहर की खेती की औसत उत्पादकता: डॉ. राज सिंह

Fiza by Fiza
August 24, 2024
in साक्षात्कार
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इन तकनीकों से बढ़ाएं अरहर की खेती की औसत उत्पादकता: डॉ. राज सिंह
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֍:1. अरहर की खेती कौन से मौसम में करनी चाहिए?§ֆ:अरहर की खेती मॉनसून के सीजन में की जाती है। अरहर केवल मॉनसून सीजन की ही नहीं बल्कि हमारे देश की भी एक महत्तवपूर्ण फसल है। अरहर एक बहुत अच्छी दलहन फसल है और इसकी दाल पोषक तत्वों से भरी होती है। इसमें लगभग 21-22 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है। पूरे देश में इसका इस्तेमाल हर घर हर रसोई में बड़े चाव से किया जाता है। लेकिन अगर पूरे देश में कुल दालों का उत्पादन देखें तो हमारे देश में कुल 25 मिलियन टन दालों का उत्पादन प्रतिवर्ष होता है, जबकि हमारी जनसंख्या के हिसाब से अगर बात की जाए तो हमारी आवश्यकता 29-30 मिलियन टन प्रतिवर्ष होती है। इसलिए हमारे देश में 4-5 मिलियन टन दालों को दूसरे देश से आयात करना पड़ता है। आज किसानों को अपने देश में उत्पादन की क्षमता को बढ़ाने की जरुरत है। ताकि भारत की दूसरे देशों पर निर्भता खत्म हो सके और हमारे देश के किसान ही हमारी मांगों को पूरा कर सकें।

§֍:2. अरहर की खेती के लिए किसानों को कौन सी तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए ? §ֆ:अरहर चने के बाद दूसरी सबसे महत्तवपूर्ण दलहन फसल है। क्योंकि चने की खेती में लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र कवर होता है। जिसका उत्पादन 12-14 मिलियन टन होता है। दालों में दूसरे नंबर अरहर का स्थान है। अरहर का उत्पादन प्रतिवर्ष हमारे देश में 4 मिलिटन टन से ज्यादा किया जाता है। लेकिन अरहर की खेती में अभी सबसे बड़ी परेशानी औसत उत्पादकता की है। जिसे किसान उन्नत तकनीकों से बढ़ा सकते हैं। उन्नत तकनीकों के जरिए अरहर की औसत उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है। साथ ही अधिक वर्षा होने पर किसान बारिश के पानी को संरक्षित कर उसका इस्तेमाल बाद में कर सकते हैं। वर्षा के पानी का उन्नत विधियों द्वारा संग्रह किया जा सकता है। किसान खेत में ‘रिज एंड फैरो तकनीक’, मलचिंग का सही तरीका, पानी को तलाब में संग्रहित करना समेत कई अन्य तकनीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर किसान इन तकनीकों को ध्यान में रखकर खेती करें तो वह मॉनसून के मौसम में अरहर की खेती से अधिक मुनाफा कमा सकते हैं।

§֍:3. भारी बारिश में कैसे करें फसल का बचाव ?§ֆ:अरहर की खेती मॉनसून की प्रमुख फसलों में की जाती है। अकसर कई राज्यों में ज्यादा बारिश होने के कारण किसानों की फसल बर्बाद हो जाती है। इसलिए किसानों को अधिक वर्षा की स्थिति में फसल बचाव का पूरा ध्यान रखना चाहिए। अधिक वर्षा के अलर्ट को जानने के लिए किसानों को समय- समय पर मौसम विभाग की ओर से फसलों के लिए जारी सूचनाओं का विशेष ध्यान रखना चाहिए। ताकि ज्यादा बारिश से फसल के नुकसान को बचाया जा सके।


§֍:4. अरहर की खेती के लिए किसान इन बातों का रखें विशेष ख्याल ?§ֆ:सबसे पलहले किसान खेतों में अरहर की बुवाई करने के बाद समय-समय पर निराई-गुड़ाई का काम करें और खरपतवारों को उखाड़कर जमीन में ही दबा दें. साथ ही अरहर की फसल में बुआई के 30 दिन बाद फूल आने पर पहली सिंचाई कर लें। दूसरी सिंचाई का काम फसल में फली आने पर यानी करीब 70 दिन करना चाहिये। लेकिन अरहर की सिंचाई बारिश पर भी निर्भर करती है, कम बारिश पड़ने पर बुआई से 110 दिन बाद भी फसल में पानी लगा देना चाहिये। किसान अरहर में कीट और बीमारियों की निगरानी करते रहें और इनकी रोकथाम के लिये जैविक कीटनाशकों का ही इस्तेमाल करें। ताकि फसल का किसी भी तरीके से नुकसान ना हो सके।

§दलहन उत्पादन के क्षेत्र में किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिये सरकार लगातार प्रयासरत है। इसी के साथ किसानों को अधिक उत्पादन देने वाली दाल की अच्छी किस्मों की खेती के लिये भी किसानों को काफी प्रोत्साहित किया जा रहा है। दालों की खेती के बारे में बात करें तो भारत में अरहर दाल बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। दुनिया का 85% अरहर उत्पादन भारत में ही होता है। प्रोटीन, खनिज, कार्बोहाइड्रेट, लोहा, कैल्शियम आदि पोषक तत्वों से भरपूर अरहर को दालों का राजा भी कहते हैं। इसकी खेती मुख्यरूप से महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात में की जाती है। इस बीच फसल क्रांति की पत्रकार फिजा काजमी ने बात की आईसीएआर पूसा, सस्य विज्ञान विभाग के एग्रीकल्चर साइंटिस्ट डॉ राज सिंह से, जिन्होंने अरहर की खेती के लिए किसानों को दी महत्तवपर्ण जानकारी पेश हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश।

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