भारत के गैर-सब्सिडी उर्वरक क्षेत्र में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए इंडियन माइक्रो-फर्टिलाइजर्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IMMA) ने इंडिया हैबिटेट सेंटर में अपना दूसरा B2G (बिजनेस-टू-गवर्नमेंट) राउंडटेबल 2025 आयोजित किया। “इनोवेट, रेगुलेट, एलीवेट: शेपिंग इंडिया’ज़ फर्टिलाइज़र फ्यूचर” थीम पर आयोजित इस कार्यक्रम में कृषि मंत्रालय, नियामक एजेंसियों और उर्वरक उद्योग के प्रमुख प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
इस आयोजन का उद्देश्य था, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स, बायो-स्टिमुलेंट्स और स्पेशलिटी फर्टिलाइजर्स के क्षेत्र में मौजूद छह प्रमुख चुनौतियों पर विचार करना और उनके समाधान हेतु व्यावहारिक सिफारिशें प्रस्तुत करना।
पुरानी उर्वरक ग्रेड संरचनाओं में सुधार की आवश्यकता
बैठक में यह प्रमुखता से सामने आया कि कई राज्यों में अब भी 1990 के दशक के उर्वरक ग्रेड मानकों का पालन किया जा रहा है, जो वर्तमान वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों के अनुरूप नहीं हैं। IMMA ने एक गतिशील फॉर्मूलेशन प्रणाली का प्रस्ताव दिया जिसमें निर्माता, केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित पोषक तत्वों की सीमा के भीतर रहते हुए, अपने उत्पादों को एकीकृत डिजिटल पोर्टल पर पंजीकृत कर सकें। इससे किसानों को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार प्रभावी उत्पाद मिल सकेंगे, और उत्पादों की गुणवत्ता व ट्रेसबिलिटी सुनिश्चित होगी।
नकली उर्वरकों पर रोक के लिए उद्योग-प्रेरित उपाय
नकली और घटिया गुणवत्ता वाले उर्वरकों से फसल की पैदावार और किसानों का भरोसा दोनों ही प्रभावित होते हैं। IMMA ने QR कोड आधारित स्मार्ट लेबलिंग, टेम्पर-प्रूफ पैकेजिंग और डिजिटल ट्रेसबिलिटी जैसे उपायों को अपनाने का सुझाव दिया। इसके साथ ही, सदस्य कंपनियों को किसान जागरूकता अभियान चलाने और ट्रैसेबल इन्वेंट्री प्रणाली अपनाने की सिफारिश की गई। IMMA इन प्रयासों को संस्थागत समर्थन और कानूनी कार्रवाई के माध्यम से मजबूत करेगा।
“वन नेशन, वन लाइसेंस” की मांग
वर्तमान में राज्यवार लाइसेंसिंग प्रक्रिया कंपनियों के लिए समय और संसाधनों की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है। IMMA ने एक केंद्रीय फर्टिलाइज़र लाइसेंसिंग पोर्टल की स्थापना की मांग की जिससे एक बार उत्पाद विवरण अपलोड करके पूरे देश में अनुमति प्राप्त की जा सके। इससे अनुमानित ₹65 लाख प्रति कंपनी प्रति वर्ष की बचत होगी और बाजार तक उत्पादों की पहुंच भी तेज होगी।
बायो-स्टिमुलेंट्स के नियमन में क्रियान्वयन की खामियाँ
हालांकि हाल ही में FCO के तहत बायो-स्टिमुलेंट्स को औपचारिक मान्यता मिली है, लेकिन कई राज्य अब तक अपने डिजिटल पोर्टल और प्रयोगशाला सुविधाओं को अपडेट नहीं कर पाए हैं। इस स्थिति में, IMMA ने NABL-प्रमाणित प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट को अंतरिम रूप से मान्य करने और जून 2025 से पहले निर्मित उत्पादों को उनकी एक्सपायरी तक बिक्री की अनुमति देने का सुझाव दिया। साथ ही राज्य स्तरीय केमिस्टों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम की तत्काल आवश्यकता बताई गई।
गैर-सब्सिडी उर्वरकों के लिए नियमों के अपराधीकरण को समाप्त करने की सिफारिश
गैर-सब्सिडी वाले उर्वरक खुले बाजार में बिकते हैं, अतः उन पर आवश्यक वस्तु अधिनियम (ECA) के तहत कठोर दंड उचित नहीं है। IMMA ने एक श्रेणीबद्ध उल्लंघन प्रणाली की सिफारिश की जो प्रक्रियात्मक त्रुटियों और धोखाधड़ी के मामलों में अंतर करे। इससे नवाचार को प्रोत्साहन मिलेगा और उद्यमियों में नियमों को लेकर भय नहीं रहेगा।
भारत को वैश्विक उर्वरक विनिर्माण केंद्र बनाने की दिशा में कदम
विश्व स्तर पर माइक्रोन्यूट्रिएंट्स, बायो-स्टिमुलेंट्स और जल में घुलनशील उर्वरकों की बढ़ती मांग को देखते हुए, IMMA ने एक उदार निर्यात नीति की वकालत की। वर्तमान में निर्यात प्रक्रिया में कई अप्रासंगिक मंजूरियाँ बाधा बन रही हैं। IMMA ने “ग्रीन चैनल” निर्यात नीति, सिंगल विंडो अप्रूवल प्रणाली और अंतरराज्यीय बिक्री नियमों में समानता की मांग की, जिससे भारतीय उत्पादक चीन और तुर्की जैसे देशों से मुकाबला कर सकें।
संयुक्त प्रयासों से आगे बढ़ेगा क्षेत्र
कार्यक्रम के समापन पर IMMA ने इस राउंडटेबल को संवाद का नहीं, बल्कि कार्रवाई का मंच बताया। एसोसिएशन ने सरकार की आत्मनिर्भर कृषि और मेक इन इंडिया फॉर द वर्ल्ड जैसी पहलों को समर्थन देते हुए अपनी सिफारिशें औपचारिक रूप से कृषि मंत्रालय को सौंपने की घोषणा की।
सभी प्रतिभागियों की सर्वसम्मति रही कि नीति सुधारों में अब पारदर्शिता, लचीलापन और विश्वास को प्राथमिकता देनी होगी। खाद्य सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और किसान लाभ के संदर्भ में यह स्पष्ट संदेश था — अब समय आ गया है साहसी और समकालीन नीतियों को अपनाने का।
इंडियन माइक्रो-फर्टिलाइजर्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IMMA) द्वारा आयोजित दूसरे B2G राउंडटेबल 2025 में कृषि क्षेत्र से जुड़ी प्रमुख संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने सक्रिय भागीदारी की और उर्वरक क्षेत्र में सुधार की दिशा में अपने महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए।
इस विचारमंच में फर्टिलाइज़र एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI), नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NSAI) तथा बायोलॉजिकल एग्री सोल्यूशन एसोसिएशन ऑफ इंडिया जैसे अग्रणी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इन संस्थाओं के विशेषज्ञों ने मौजूदा नीतियों, चुनौतियों और संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा की। कार्यक्रम में कृषि मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी एवं विभिन्न राज्य सरकारों के कृषि विभागों से जुड़े प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।
इस अवसर पर IMMA के अध्यक्ष डॉ. राहुल मिरचंदानी ने फसल क्रांति से विशेष बातचीत में बताया:
“माइक्रो-फर्टिलाइज़र भारत में तेजी से उभरता हुआ क्षेत्र है। इसकी घरेलू मांग निरंतर बढ़ रही है, और अब भारत से विदेशी बाजारों में भी इन उत्पादों का निर्यात हो रहा है। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि हम इस क्षेत्र में आवश्यक संरचनात्मक सुधार लाएं। विशेष रूप से ‘वन नेशन, वन लाइसेंस‘ नीति और ‘स्मार्ट लेबलिंग‘ जैसे उपायों को प्राथमिकता से लागू किया जाए। इन बदलावों से न केवल उद्योग को नई दिशा मिलेगी, बल्कि किसानों तक गुणवत्तापूर्ण उत्पाद तेजी से पहुँच सकेंगे।”
डॉ.राहुल मिरचंदानी ने यह भी रेखांकित किया कि भारत को specialty agri-inputs के वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए, उद्योग और सरकार के बीच सहयोग अत्यंत आवश्यक है।
इस राउंडटेबल के माध्यम से स्पष्ट संदेश गया कि यदि उर्वरक क्षेत्र में पारदर्शिता, नवाचार और डिजिटल सुधारों को बढ़ावा दिया जाए, तो यह भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अग्रणी बना सकता है। IMMA शीघ्र ही इस बैठक में प्राप्त सुझावों और सिफारिशों को संकलित कर कृषि मंत्रालय के सामने इन सुझावों को रखा, जिससे नीतिगत फैसलों में उद्योग की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

