भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली के कृषि अर्थशास्त्र विभाग द्वारा “कृषि प्रौद्योगिकियों के प्रभाव के आकलन हेतु पद्धतिगत ढाँचे” विषय पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य था – कृषि नवाचारों के प्रभावों का मूल्यांकन करने हेतु वैज्ञानिक, साक्ष्य-आधारित एवं पद्धतिगत दृष्टिकोण को सुदृढ़ करना, ताकि उत्पादकता, स्थिरता और नीतिगत निर्णयों को बेहतर दिशा दी जा सके।
कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए आईएआरआई के निदेशक एवं कुलपति डॉ. चिरुकमल्ली श्रीनिवास राव ने वर्तमान कृषि परिदृश्य में प्रौद्योगिकियों के प्रभाव मूल्यांकन की महत्ता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, पोषण सुरक्षा, पर्यावरणीय स्थिरता, किसानों की आय और रोजगार सृजन जैसी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, टिकाऊ कृषि समाधान खोजने की आवश्यकता है और इसके लिए प्रभाव आकलन अत्यंत आवश्यक उपकरण है।
आईएफपीआरआई-दक्षिण एशिया के पूर्व निदेशक डॉ. पी.के. जोशी ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि कृषि नीति निर्माण और निवेश निर्णयों को सही दिशा देने में प्रभाव आकलन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने भारत में अपनाई गई विभिन्न कृषि तकनीकों की यात्रा और उनके सकारात्मक परिणामों पर आधारित केस स्टडीज़ भी साझा कीं।
संस्थान के संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. सी. विश्वनाथन ने प्रभाव अध्ययनों में आर्थिक अधिशेष मॉडल और यादृच्छिक नियंत्रण परीक्षणों (RCTs) की उपयोगिता पर प्रकाश डाला और इन पद्धतियों की वैज्ञानिकता को रेखांकित किया।
कार्यशाला के दौरान डॉ. राव की अध्यक्षता में एक पैनल चर्चा भी आयोजित की गई, जिसमें नीति और अनुसंधान के क्षेत्र से जुड़े प्रमुख विशेषज्ञों जैसे –
- डॉ. राका सक्सेना (नीति आयोग),
- डॉ. अंजनी कुमार (आईएफपीआरआई),
- डॉ. आर.एन. पडारिया (आईएआरआई),
- और डॉ. स्मिता सिरोही (आईसीएआर)
ने भाग लिया। पैनल ने इस बात पर विशेष बल दिया कि प्रभाव आकलन अध्ययनों को राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं से जोड़ा जाए और अंतःविषय सहयोग को सशक्त बनाया जाए।
इस कार्यशाला में नीति आयोग, आईएफपीआरआई, राष्ट्रीय कृषि नवाचार परियोजना (NAIP), राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी (NAARM), आईसीएआर के विभिन्न संस्थान जैसे केंद्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान, आईएआरआई-असम केंद्र, तथा अन्य इकाइयों से आए 53 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
कार्यशाला ने प्रभाव मूल्यांकन की नीतिगत प्रासंगिकता पर गहन संवाद को प्रोत्साहित किया और कृषि प्रौद्योगिकियों के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को समझने की दिशा में एक सशक्त मंच प्रदान किया। यह आयोजन भविष्य में कृषि नीति निर्धारण और संसाधन प्रबंधन में ठोस, डेटा-संचालित निर्णयों को बल देने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

