भारत में अमरूद की खेती अब संकट में है। अमरूद उत्पादक राज्यों में एक गंभीर और तेजी से फैलने वाला रोग – उकठा (Wilt Disease) – किसानों की सबसे बड़ी चिंता बन गया है। यह मिट्टी जनित रोग जब सूत्रकृमियों (Nematodes) के साथ जुड़ता है, तो अमरूद के पूरे बाग को खत्म करने की ताकत रखता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह रोग अगस्त से अक्टूबर के बीच सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है और पूरे पौधे को कुछ ही हफ्तों में बर्बाद कर सकता है।
कैसे करता है पेड़ों को बर्बाद?
उकठा रोग की शुरुआत पत्तियों के पीले पड़ने और मुरझाने से होती है। धीरे-धीरे शाखाएं सूखने लगती हैं और पूरा पेड़ निष्क्रिय हो जाता है। संवहन ऊतक के रंग में बदलाव, जड़ों पर काली धारियां, तने का भूरा होना, और फलों का सख्त व पथरीला हो जाना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। कुछ मामलों में पेड़ की मृत्यु कुछ ही हफ्तों में हो सकती है, और उपज में 30 से 100% तक की कमी देखी गई है।
क्यों होता है यह रोग?
यह रोग मुख्य रूप से मिट्टी में रहने वाले रोगजनकों और सूत्रकृमियों के कारण होता है। लगातार संक्रमण होने पर यह पूरी बागवानी को प्रभावित कर सकता है, जिससे किसान को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
उकठा रोग से बचाव के प्रभावी उपाय:
जैविक उपाय:
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ट्राइकोडर्मा हार्ज़ियानम/विरिडे: 50–100 ग्राम प्रति पौधा जड़ों के पास मिट्टी में मिलाकर सिंचाई करें।
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VAM (वेसिकुलर अर्बस्कुलर माइकोराइजा): 5 किलो प्रति पौधा प्रयोग करें।
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स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस और बेसिलस एमाइलोलिक्विफेशियंस: मिट्टी की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।
रासायनिक नियंत्रण:
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कर्बेन्डाजिम 50% WP: 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर 20–30 लीटर प्रति पौधा की मृदा डेंचिंग करें।
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यह प्रक्रिया मानसून शुरू होने से पहले और 20 दिन के अंतराल पर दोहराएं।
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जिंक सल्फेट + DAP का छिड़काव: पोषण बढ़ाता है और रोगों से लड़ने की शक्ति देता है।
सहायक उपाय:
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500–1000 किग्रा/हेक्टेयर जिप्सम का प्रयोग मिट्टी में मौजूद रोगजनकों को निष्क्रिय करता है।
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जैविक खाद और संतुलित NPK उर्वरक से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है।
किसानों के लिए सलाह:
यदि आपके बाग में अमरूद के पेड़ों में पत्तियों का पीला पड़ना, मुरझाना या शाखाओं का सूखना दिखे, तो इसे हल्के में न लें। यह उकठा रोग की शुरुआती चेतावनी हो सकती है। समय रहते पहचान और एकीकृत प्रबंधन ही आपकी पूरी फसल को बचा सकता है।
अमरूद के उत्पादकों के लिए यह समय सावधानी बरतने का है। रोग की पहचान, जैविक और रासायनिक उपायों का संतुलित प्रयोग और मिट्टी की देखभाल से ही इस संकट से बचा जा सकता है।

