पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के कपास उत्पादक क्षेत्रों में ग्रीन लीफहॉपर (हरा तेला या हरा फुदका) का भारी प्रकोप देखा जा रहा है। कई सालों बाद इस कीट के हमले ने किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं, क्योंकि इससे कपास की उपज में 30% तक की गिरावट का अनुमान है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार अनुकूल मौसम (लगातार बारिश, नमी और बादल छाए रहना) ने इस कीट के प्रजनन को बढ़ावा दिया है।
कैसे करें हरे फुदके की पहचान?
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यह कीट 3.5 मिमी लंबा, हल्के हरे रंग का होता है और पत्तियों पर तिरछी गति से चलता है।
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इसके शिशु और वयस्क दोनों ही पत्तियों का रस चूसकर हॉपर बर्न नामक स्थिति पैदा करते हैं, जिससे पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती हैं।
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लक्षण: पत्तियों का किनारों से पीला पड़ना, नीचे की ओर मुड़ना और सिकुड़ना।
बचाव के उपाय
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नियमित निगरानी:
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सप्ताह में कम से कम दो बार खेतों का निरीक्षण करें, विशेषकर पत्तियों के नीचे।
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यदि एक पत्ती पर 5 से ज्यादा कीट दिखें, तो तुरंत उपचार शुरू करें।
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जैविक नियंत्रण:
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हल्के संक्रमण की स्थिति में नीम का तेल या अन्य जैव-कीटनाशकों का छिड़काव करें।
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रासायनिक उपचार (गंभीर संक्रमण में):
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टॉल्फेनपाइराड 15 EC (300 मिली/एकड़)
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फ्लोनिकामिड 50 WG (80 ग्राम/एकड़)
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थायोमेथोक्साम 25 WG (40 ग्राम/एकड़)
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छिड़काव का सही तरीका:
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सुबह या शाम को छिड़काव करें, जब हवा शांत हो।
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पत्तियों के नीचे तक दवा पहुंचाएं, क्योंकि कीट वहीं छिपे होते हैं।
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खरपतवार प्रबंधन:
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खेतों के आसपास की घास और खरपतवार हटाएं, क्योंकि ये कीटों के लिए प्रजनन स्थल बन सकते हैं।
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किसानों की स्थिति
पंजाब के मानसा और राजस्थान के हनुमानगढ़ जैसे जिलों में किसानों ने बताया कि उनकी पूरी फसल प्रभावित हुई है। कुछ किसानों को 20-25% उपज घटने की आशंका है, जबकि अन्य ने बताया कि देरी से उपचार शुरू करने के कारण नुकसान और बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते समेकित कीट प्रबंधन (IPM) अपनाया जाए, तो फसल को बचाया जा सकता है। कृषि विभाग ने किसानों से नियमित निगरानी और त्वरित कार्रवाई का आग्रह किया है।

