֍:केंद्र प्रभारी ने दी जानकारी§ֆ:केन्द्र के प्रभारी अधिकारी ने बताया कि ड्रोन का सजीव प्रदर्शन करने का प्राथमिक उद्देश्य कठिन परिश्रम को कम करने, उत्पादकता बढ़ाने, मिट्टी के स्वास्थ्य का प्रबंधन करने, फसल के कीटों और बीमारियों की पहचान करने तथा पोषण संबन्धी कमियों का पता लगाने, फसल की उपज का अनुमान लगाने के लिए आधुनिक कृषि तकनीकों में एग्री-ड्रोन के उपयोग को प्रदर्शित करना था. §֍:इन वैज्ञानिकों की रही भागीदारी§ֆ:कृषि विज्ञान केंद्र के पशुपालन विशेषज्ञ डॉ. पी.के. मडके ने किसानों से फसलों के स्वास्थ्य की सटीक निगरानी करने और अपने खेतों पर संसाधनों के आवंटन को अधिकतम करने के लिए ड्रोन का उपयोग करने का आग्रह किया. गृह वैज्ञानिक डॉ. विनिता सिंह ने बताया कि ड्रोन से सटीक खेती को सक्षम करके, श्रम लागत को कम करके और फसल की पैदावार बढ़ाकर कृषि को आगे बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं. मृदा विशेषज्ञ डॉ. अशोक सिंह ने बताया कि कृषि ड्रोन खेती के आधुनिक उपकरणों में से एक है, जिसके इस्तेमाल से किसानों को काफी मदद मिल सकती है. ड्रोन से बड़े क्षेत्रफल में महज कुछ मिनटों में कीटनाशक, खाद या दवाओं का छिड़काव किया जा सकता है. इससे न सिर्फ लागत में कमी आएगी, बल्कि समय की बचत भी होगी. पादप सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ. आशीष त्यागी ने बताया कि एक एकड़ में यूरिया का छिड़काव करने में एक व्यक्ति को एक से दो दिन लग जाता है. श्रमिक खर्च अधिक आता है. साथ ही छिड़काव के दौरान कीट के काटने जैसी समस्या आती है. ड्रोन के इस्तेमाल से किसानों को इन समस्याओं से निजात मिलेगी। किसान ड्रोन के इस्तेमाल से एक एकड़ फसल में खाद अन्य कीटनाशकों का छिड़काव तीस मिनट में कर सकेंगे. कृषि क्षेत्र में ड्रोन के प्रयोग से रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे. सजीव प्रदर्शन में हापुड के 28 कृषकों ने भाग लिया.§किसानों के लिए कृषि विज्ञान केंद्र तेजी से कार्य कर रहे हैं. इसी के चलते उत्तर प्रदेश के हापुड़ में स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में 27 दिसंबर शुक्रवार को ड्रोन प्रदर्शन आयोजित किया गया. इस दौरान जिला कृषि अधिकारी, हापुड ने बताया कि ड्रोन एक ऐसी ही तकनीक है, जिसमें कृषि क्षेत्र में क्रांति लाने की क्षमता है. इस तकनीक से ज़रूरत के अनुसार फसल उर्वरकों की सटीक मात्रा एवं सही प्रयोग के बारे में जानकारी मिलती है. इससे सीधे सामग्री के उपयोग की दक्षता में वृद्धि होती है एवं किसान भी सुरक्षित रहते हैं, साथ ही खेती की कुल लागत भी कम होती है.

