जब भारत आज़ादी के बाद भूखमरी और खाद्यान्न संकट के दौर से गुजर रहा था, तब एक वैज्ञानिक ने अपने ज्ञान, समर्पण और दृष्टिकोण से देश को कृषि आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर किया। वह वैज्ञानिक थे – डॉ. मोंटगौरी शंकरन स्वामीनाथन, जिन्हें पूरी दुनिया आज भारत की हरित क्रांति के जनक के नाम से जानती है। उन्होंने न केवल भारतीय कृषि को एक नई वैज्ञानिक दिशा दी, बल्कि किसानों के सम्मान और अधिकारों को भी राष्ट्रीय विमर्श में स्थापित किया।
प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त 1925 को कुंबकोणम, तमिलनाडु के एक शिक्षित और समाजसेवी परिवार में हुआ। उनके पिता, डॉ. मोंटगौरी नटराजन, एक प्रख्यात चिकित्सक थे जो गरीबों और असहायों की सेवा निःशुल्क करते थे। उनके घर का माहौल सेवा, समर्पण और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण था। यही संस्कार बालक स्वामीनाथन के व्यक्तित्व निर्माण की नींव बने।
बाल्यकाल में ही उन्होंने अपने पिता को गरीब रोगियों की सेवा करते देखा, जिससे उनके भीतर समाजसेवा की गहरी भावना विकसित हुई। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने कुंबकोणम से ही प्राप्त की और स्कूली शिक्षा के दौरान ही उन्हें प्रकृति, जीवविज्ञान और खेती में रुचि हो गई।
शिक्षा और वैज्ञानिक प्रशिक्षण
भारत में उस समय के सीमित संसाधनों के बावजूद, डॉ. स्वामीनाथन ने अकादमिक उत्कृष्टता हासिल की। उन्होंने मद्रास कृषि महाविद्यालय से कृषि विज्ञान में स्नातक किया और फिर इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट (IARI), नई दिल्ली से पौध आनुवंशिकी एवं प्रजनन में विशेषज्ञता प्राप्त की।
उनकी प्रतिभा ने उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (यूके) और विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय (यूएसए) तक पहुंचाया, जहां उन्होंने कृषि विज्ञान में डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की। उनका शोध कार्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया।
उनकी थीसिस – “Potato Genetics and Breeding” ने उन्हें विश्व कृषि वैज्ञानिकों की कतार में ला खड़ा किया।
भारत वापसी और हरित क्रांति की नींव
1950 के दशक के उत्तरार्ध में जब भारत गंभीर खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था, उस समय डॉ. स्वामीनाथन ने विदेशी नौकरियों के प्रस्तावों को ठुकरा कर भारत लौटने का निर्णय लिया। उनका कहना था –
“मैं उस देश में नौकरी क्यों करूं जो पहले से समृद्ध है, जबकि मेरा अपना देश भूख से लड़ रहा है?”
यह वह समय था जब भारत को अमेरिका से PL-480 स्कीम के तहत गेहूं आयात करना पड़ता था। देश में अकाल, गरीबी और भुखमरी चरम पर थी।
भारत लौटने के बाद, उन्होंने IARI में वैज्ञानिक के रूप में कार्य शुरू किया। यहीं पर उन्होंने नॉर्मन बोरलॉग के साथ मिलकर उच्च उपज वाली गेहूं और चावल की किस्में विकसित करने का कार्य शुरू किया।
हरित क्रांति की शुरुआत
डॉ. स्वामीनाथन के नेतृत्व में 1960 के दशक में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उच्च उत्पादक बीजों, रासायनिक उर्वरकों और सिंचाई तकनीकों का सफल प्रयोग किया गया। परिणामस्वरूप:
इस आंदोलन को ही आगे चलकर कहा गया – हरित क्रांति, और इसके मूल शिल्पकार बने – डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन।
संस्थागत नेतृत्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
डॉ. स्वामीनाथन केवल एक प्रयोगशाला वैज्ञानिक नहीं थे, वे एक दूरदर्शी नीति निर्माता और प्रशासक भी थे। वे अनेक प्रमुख पदों पर रहे:
उनका मानना था कि “वैज्ञानिक शोध का वास्तविक मूल्य तभी है जब उसका लाभ अंतिम किसान तक पहुंचे।”
स्वामीनाथन आयोग और किसान नीति
2004 में भारत सरकार ने उन्हें राष्ट्रीय किसान आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया, जिसे आम बोलचाल में स्वामीनाथन आयोग कहा जाता है।
इस आयोग की रिपोर्ट 2006 में आई, जिसमें उन्होंने निम्नलिखित प्रमुख सिफारिशें की:
एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (MSSRF)
1990 में उन्होंने एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (MSSRF) की स्थापना की, जो आज भी:
जैसे क्षेत्रों में अग्रणी कार्य कर रहा है।
इस संस्थान ने ग्रामीण क्षेत्रों में विज्ञान और तकनीक के माध्यम से आजीविका सुधारने का अभूतपूर्व कार्य किया है।
प्रमुख पुरस्कार और सम्मान
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन को भारत और विश्वभर से दर्जनों प्रतिष्ठित पुरस्कार और उपाधियाँ प्राप्त हुईं:
वर्ष पुरस्कार / सम्मान
TIME मैगज़ीन द्वारा 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली एशियाई व्यक्तियों में शामिल
निजी जीवन
डॉ. स्वामीनाथन का विवाह मायाम्मा स्वामीनाथन से हुआ था। उन्हें तीन बेटियाँ हैं। उनकी बेटी डॉ. सौम्या स्वामीनाथन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) में मुख्य वैज्ञानिक रह चुकी हैं।
उनका पारिवारिक जीवन भी सादगी और सेवा भाव से प्रेरित था। वे हमेशा कहते थे –
“जीवन का उद्देश्य केवल उपलब्धियां नहीं, बल्कि समाज के लिए उपयोगी बनना है।”
डॉ. स्वामीनाथन का दृष्टिकोण और दर्शन
निधन और राष्ट्र की श्रद्धांजलि
28 सितंबर 2023 को चेन्नई में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे 98 वर्ष के थे। उनके निधन पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कृषि वैज्ञानिकों, किसानों और आम नागरिकों ने गहरा शोक व्यक्त किया। उन्हें पूरे सम्मान के साथ विदाई दी गई।
उनकी मृत्यु एक युग का अंत थी, लेकिन उनका कार्य और विचार आज भी कृषि नीतियों और किसान आंदोलनों की प्रेरणा बने हुए हैं।
निष्कर्ष
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन केवल एक वैज्ञानिक नहीं थे, वे एक युगद्रष्टा, राष्ट्र निर्माता और कृषि क्रांति के अग्रदूत थे। उन्होंने भूख से जूझते भारत को अन्न में आत्मनिर्भर बनाया, किसानों को आत्मसम्मान दिलाया और विज्ञान को समाज की सेवा में लगाया।
आज जब भारत जलवायु परिवर्तन, कृषि संकट, और किसान आत्महत्याओं से जूझ रहा है, तब स्वामीनाथन मॉडल और उनकी सोच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।
हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम उनके विचारों को नीतियों में उतारें, किसानों को सशक्त करें और सतत कृषि विकास को अपनाएं।
अंतिम शब्द
“डॉ. स्वामीनाथन हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सोच, उनके बीज, उनके विचार और उनका सपना आज भी खेतों में लहलहा रहा है।”
वे चले गए, परंतु भारत के हर खेत, हर किसान और हर अन्न के दाने में उनकी आत्मा बसी है।
प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त 1925 को कुंबकोणम, तमिलनाडु के एक शिक्षित और समाजसेवी परिवार में हुआ। उनके पिता, डॉ. मोंटगौरी नटराजन, एक प्रख्यात चिकित्सक थे जो गरीबों और असहायों की सेवा निःशुल्क करते थे। उनके घर का माहौल सेवा, समर्पण और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण था। यही संस्कार बालक स्वामीनाथन के व्यक्तित्व निर्माण की नींव बने।
बाल्यकाल में ही उन्होंने अपने पिता को गरीब रोगियों की सेवा करते देखा, जिससे उनके भीतर समाजसेवा की गहरी भावना विकसित हुई। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने कुंबकोणम से ही प्राप्त की और स्कूली शिक्षा के दौरान ही उन्हें प्रकृति, जीवविज्ञान और खेती में रुचि हो गई।
शिक्षा और वैज्ञानिक प्रशिक्षण
भारत में उस समय के सीमित संसाधनों के बावजूद, डॉ. स्वामीनाथन ने अकादमिक उत्कृष्टता हासिल की। उन्होंने मद्रास कृषि महाविद्यालय से कृषि विज्ञान में स्नातक किया और फिर इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट (IARI), नई दिल्ली से पौध आनुवंशिकी एवं प्रजनन में विशेषज्ञता प्राप्त की।
उनकी प्रतिभा ने उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (यूके) और विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय (यूएसए) तक पहुंचाया, जहां उन्होंने कृषि विज्ञान में डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की। उनका शोध कार्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया।
उनकी थीसिस – “Potato Genetics and Breeding” ने उन्हें विश्व कृषि वैज्ञानिकों की कतार में ला खड़ा किया।
भारत वापसी और हरित क्रांति की नींव
1950 के दशक के उत्तरार्ध में जब भारत गंभीर खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था, उस समय डॉ. स्वामीनाथन ने विदेशी नौकरियों के प्रस्तावों को ठुकरा कर भारत लौटने का निर्णय लिया। उनका कहना था –
“मैं उस देश में नौकरी क्यों करूं जो पहले से समृद्ध है, जबकि मेरा अपना देश भूख से लड़ रहा है?”
यह वह समय था जब भारत को अमेरिका से PL-480 स्कीम के तहत गेहूं आयात करना पड़ता था। देश में अकाल, गरीबी और भुखमरी चरम पर थी।
भारत लौटने के बाद, उन्होंने IARI में वैज्ञानिक के रूप में कार्य शुरू किया। यहीं पर उन्होंने नॉर्मन बोरलॉग के साथ मिलकर उच्च उपज वाली गेहूं और चावल की किस्में विकसित करने का कार्य शुरू किया।
हरित क्रांति की शुरुआत
डॉ. स्वामीनाथन के नेतृत्व में 1960 के दशक में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उच्च उत्पादक बीजों, रासायनिक उर्वरकों और सिंचाई तकनीकों का सफल प्रयोग किया गया। परिणामस्वरूप:
- भारत में गेहूं और चावल की उपज कई गुना बढ़ गई
- खाद्यान्न संकट पर नियंत्रण पाया गया
- भारत अन्न आयातक से अन्न आत्मनिर्भर देश बनने की ओर बढ़ा
इस आंदोलन को ही आगे चलकर कहा गया – हरित क्रांति, और इसके मूल शिल्पकार बने – डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन।
संस्थागत नेतृत्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
डॉ. स्वामीनाथन केवल एक प्रयोगशाला वैज्ञानिक नहीं थे, वे एक दूरदर्शी नीति निर्माता और प्रशासक भी थे। वे अनेक प्रमुख पदों पर रहे:
- IARI के निदेशक
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक
- भारतीय योजना आयोग के सदस्य
- FAO (संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन) में वरिष्ठ पद
- यूनेस्को और UNEP जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सलाहकार
उनका मानना था कि “वैज्ञानिक शोध का वास्तविक मूल्य तभी है जब उसका लाभ अंतिम किसान तक पहुंचे।”
स्वामीनाथन आयोग और किसान नीति
2004 में भारत सरकार ने उन्हें राष्ट्रीय किसान आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया, जिसे आम बोलचाल में स्वामीनाथन आयोग कहा जाता है।
इस आयोग की रिपोर्ट 2006 में आई, जिसमें उन्होंने निम्नलिखित प्रमुख सिफारिशें की:
- किसानों को उत्पादन लागत + 50% न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) दिया जाए
- भूमिहीन किसानों को भूमि अधिकार दिए जाएं
- कृषि बीमा और ऋण माफी को प्रभावी बनाया जाए
- संपूर्ण ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया जाए
- महिला किसानों को भूमि स्वामित्व और प्रशिक्षण में प्राथमिकता दी जाए
- यह रिपोर्ट आज भी भारतीय कृषि नीति की रीढ़ मानी जाती है।
एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (MSSRF)
1990 में उन्होंने एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (MSSRF) की स्थापना की, जो आज भी:
- जैव विविधता संरक्षण
- महिला सशक्तिकरण
- सतत कृषि विकास
- डिजिटल कृषि प्रशिक्षण
जैसे क्षेत्रों में अग्रणी कार्य कर रहा है।
इस संस्थान ने ग्रामीण क्षेत्रों में विज्ञान और तकनीक के माध्यम से आजीविका सुधारने का अभूतपूर्व कार्य किया है।
प्रमुख पुरस्कार और सम्मान
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन को भारत और विश्वभर से दर्जनों प्रतिष्ठित पुरस्कार और उपाधियाँ प्राप्त हुईं:
वर्ष पुरस्कार / सम्मान
- 1967 पद्मश्री
- 1971 मैगसेसे पुरस्कार
- 1972 पद्म भूषण
- 1987 विश्व खाद्य पुरस्कार
- 1989 पद्म विभूषण
- 1999 इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार
- 2000 UNESCO जैव विविधता पदक
- 2014 लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय पुरस्कार
TIME मैगज़ीन द्वारा 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली एशियाई व्यक्तियों में शामिल
निजी जीवन
डॉ. स्वामीनाथन का विवाह मायाम्मा स्वामीनाथन से हुआ था। उन्हें तीन बेटियाँ हैं। उनकी बेटी डॉ. सौम्या स्वामीनाथन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) में मुख्य वैज्ञानिक रह चुकी हैं।
उनका पारिवारिक जीवन भी सादगी और सेवा भाव से प्रेरित था। वे हमेशा कहते थे –
“जीवन का उद्देश्य केवल उपलब्धियां नहीं, बल्कि समाज के लिए उपयोगी बनना है।”
डॉ. स्वामीनाथन का दृष्टिकोण और दर्शन
- कृषि को व्यवसाय नहीं, संस्कृति मानते थे
- जलवायु परिवर्तन और टिकाऊ खेती पर निरंतर कार्य किया
- महिला किसानों को अधिकार देने के पक्षधर रहे
- किसानों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण और तकनीकी सशक्तिकरण पर बल दिया
- उनका कहना था –“अगर किसान खुशहाल नहीं है, तो राष्ट्र कभी समृद्ध नहीं हो सकता।”
निधन और राष्ट्र की श्रद्धांजलि
28 सितंबर 2023 को चेन्नई में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे 98 वर्ष के थे। उनके निधन पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कृषि वैज्ञानिकों, किसानों और आम नागरिकों ने गहरा शोक व्यक्त किया। उन्हें पूरे सम्मान के साथ विदाई दी गई।
उनकी मृत्यु एक युग का अंत थी, लेकिन उनका कार्य और विचार आज भी कृषि नीतियों और किसान आंदोलनों की प्रेरणा बने हुए हैं।
निष्कर्ष
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन केवल एक वैज्ञानिक नहीं थे, वे एक युगद्रष्टा, राष्ट्र निर्माता और कृषि क्रांति के अग्रदूत थे। उन्होंने भूख से जूझते भारत को अन्न में आत्मनिर्भर बनाया, किसानों को आत्मसम्मान दिलाया और विज्ञान को समाज की सेवा में लगाया।
आज जब भारत जलवायु परिवर्तन, कृषि संकट, और किसान आत्महत्याओं से जूझ रहा है, तब स्वामीनाथन मॉडल और उनकी सोच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।
हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम उनके विचारों को नीतियों में उतारें, किसानों को सशक्त करें और सतत कृषि विकास को अपनाएं।
अंतिम शब्द
“डॉ. स्वामीनाथन हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सोच, उनके बीज, उनके विचार और उनका सपना आज भी खेतों में लहलहा रहा है।”
वे चले गए, परंतु भारत के हर खेत, हर किसान और हर अन्न के दाने में उनकी आत्मा बसी है।

