बासमती धान के लिए जानलेवा बकानी रोग (Bakanae Disease) का प्रकोप दशकों से किसानों की चिंता का कारण बना हुआ है। यह रोग फफूंद Fusarium fujikuroi (पहले Gibberella fujikuroi के नाम से जाना जाता था) के कारण फैलता है, जो पौधों में गिब्बेरेलिक एसिड नामक हार्मोन बनाकर उन्हें असामान्य रूप से लंबा कर देता है, जिससे पौधे सूख जाते हैं और उपज में 20% तक की कमी आ जाती है। हालांकि, अब पूसा के पूर्व निदेशक डॉ. अशोक कुमार सिंह (एके सिंह) के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने इस रोग के प्रतिरोधी जीन की पहचान कर ली है, जो बासमती धान की नई किस्मों को विकसित करने में मदद करेगा।
जापान से शुरू हुई बीमारी, अब दुनियाभर में कहर
बकानी (जापानी भाषा में “मूर्ख पौधा”) रोग सबसे पहले 1828 में जापान में पाया गया था। डॉ. सिंह के अनुसार, यह बीमारी बीज और मिट्टी दोनों से फैलती है। संक्रमित पौधे दूसरों से काफी लंबे और पीले दिखाई देते हैं, जिससे खेत में ही इनकी पहचान आसान हो जाती है। भारत, नेपाल, पाकिस्तान और थाईलैंड जैसे देशों में इससे 3% से 95% तक उपज नुकसान होता है।
वैज्ञानिकों ने खोजा समाधान
डॉ. सिंह ने बताया कि शोधकर्ताओं ने धान की कुछ पारंपरिक किस्मों में बकानी प्रतिरोधी जीन की पहचान की है। इन किस्मों पर Fusarium के बीजाणु डाले जाने के बाद भी रोग नहीं फैला। अब इन जीनों को बासमती धान में ट्रांसफर करने का काम चल रहा है। उम्मीद है कि 3-4 वर्षों में यह प्रतिरोधी किस्म किसानों तक पहुंच जाएगी।
रोग प्रबंधन के उपाय
फिलहाल, किसानों को बीजोपचार पर ध्यान देना चाहिए:
-
बाविस्टिन फंगीसाइड: बुवाई से पहले बीज को इसके घोल में उपचारित करें।
-
ट्राइकोडर्मा: जैविक उपचार के रूप में इसका इस्तेमाल फफूंद को रोकता है।
-
रोपाई से पहले जड़ उपचार: बाविस्टिन के घोल में पौध की जड़ें डुबोकर रोपाई करें।
भविष्य की संभावनाएं
वैज्ञानिक जीन एडिटिंग और मॉडर्न ब्रीडिंग तकनीकों जैसे GWAS और QTL मैपिंग का उपयोग कर रहे हैं ताकि रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्में तैयार की जा सकें। डॉ. सिंह के मुताबिक, यह खोज न केवल बासमती बल्कि अन्य धान किस्मों के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि साबित होगी।
बकानी रोग का प्रकोप अब धीरे-धीरे कम होगा, लेकिन फिलहाल किसानों को बीजोपचार और वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए उपायों को अपनाना चाहिए। आने वाले वर्षों में बकानी-रोधी बासमती धान की किस्में कृषि क्रांति ला सकती हैं।

