֍:शोधकर्ताओं की अगुवाई में हुआ अध्ययन§ֆ:इंग्लैंड के एक्सेटर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अगुवाई में हुए एक अध्ययन किया गया. इसमें सामने आया कि केला एक प्रमुख निर्यात की जाने वाली फसल है, जिसकी सालाना कीमत 11 अरब डॉलर है और यह कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं क लिए जरूरी है. इसके बाद भी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तत्काल हस्तक्षेप न किए जाने पर आधी सदी में वर्तमान केले का उत्पादन करने वाले 60 फीसदी क्षेत्रों में केले की फसल उगाने के ले संघर्ष करना पड़ेगा. अध्ययन में पाया गया कि श्रम उपलब्धता और बुनियादी ढांचेजासे सामाजिक-आर्थिक कारण जलवायु परिवर्तन अनुकूलन में भारी गड़बड़ी पैदा करते हैं. §֍:§ֆ:अधिकांश केले का उत्पादन घनी आबादी वाले क्षेत्रों और बंदरगाहों के पास होता है, ताकि अधिक उपयुक्त क्षेत्रों में बदलने की संभावना सीमित हो. कम सिंचाई और गर्मी सहन करने वाली केले की किस्मों के साथ पर्याप्त निवेश के बिना निर्यात किए जाने वाले केले के उत्पादन का भविष्य अनिश्चित दिखता है. §ֆ:§֍:88 हजार में होता है उत्पादन§ֆ:भारत में करीब 88 हजार हेक्टेयर में 297 लाख टन केले का उत्पादन होता है. केले का उत्पादन देश के लगभग सभी राज्यं में किया जाता है. लेकिन सबसे ज्यादा उत्पादन आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और बिहार में होता है. भारत विश्व में केले का प्रमुख उत्पादक और उपभोक्ता है. दुनियाभर के कुल केले के उत्पादन में भारत और चीन की हिस्सेदारी 27 फीसदी है. फिलीपींस, कोलंबिया इंडोनेशिया, एक्वाडोर और ब्राजील अन्य बड़े उत्पादक देश हैं.§जलवायु पतिवर्तन का असर सभी चीजों पर पड़ रहा है. इसमें मौसम, स्वास्थ्य, खेती, आदि शामिल हैं. बढ़ते तापमान के कारण साल 2080 तक केले के बागान तबाह होने की पूरी आशंका है. इस वजह से लैटिन अमेरिका और कैरिबियन के इलाकों में निर्यात के लिए केले की खेती जारी रखना घाटे का सौदा हो डाएगा. इसका असर भारत के साथ चीन पर भी पड़ेगा.

