आंध्र प्रदेश सरकार ने कृषि क्षेत्र को टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है। राज्य कृषि विभाग ने रासायनिक उर्वरकों की खपत को 11 प्रतिशत (लगभग 4 लाख मीट्रिक टन) तक कम करने का लक्ष्य तय किया है। इसके स्थान पर जैविक और जैव-उर्वरकों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी, खर्च घटेगा, और दीर्घकालीन कृषि उत्पादकता में सुधार होगा।
कृषि निदेशक एस. राव ने बताया कि धान और मक्का जैसी फसलों में अत्यधिक नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों, विशेष रूप से यूरिया के उपयोग से पौधों की संरचना कमजोर हुई है और वे कीट व बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं। उन्होंने कहा, “हमारी योजना किसानों को स्वस्थ मिट्टी और संतुलित पोषण की ओर मार्गदर्शन करना है। नाइट्रोबैक्टीरिया, फॉस्फोबैक्टीरिया, नीम की खली और नैनो यूरिया, नैनो डीएपी जैसे जैव उर्वरकों को बढ़ावा देकर हम टिकाऊ खेती और बेहतर उत्पादकता दोनों को साधने का प्रयास कर रहे हैं।”
दिल्ली राव ने यह भी बताया कि जैविक उर्वरक न केवल मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों को सक्रिय करते हैं, बल्कि जलधारण क्षमता बढ़ाने और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को भी दूर करते हैं। उन्होंने कहा, “जैव उर्वरक पौधों के लिए प्राकृतिक रूप से एंजाइम और हार्मोन उपलब्ध कराते हैं, जिससे पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और रासायनिक दवाओं पर निर्भरता घटती है।”
सरकारी योजना के तहत:
- 1 लाख मीट्रिक टन उर्वरक को प्राकृतिक खेती के माध्यम से बदला जाएगा।
- 5 लाख मीट्रिक टन उर्वरक को वर्मी कम्पोस्ट और ग्रीन मैन्योर जैसे जैविक खाद से प्रतिस्थापित किया जाएगा।
- शेष मात्रा को नवीन जैविक व नैनो उर्वरकों के माध्यम से बदला जाएगा।
इस बीच, कृषि मंत्री के. अचननायडु ने राज्य में उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर किसानों को आश्वस्त किया है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में 8.41 लाख मीट्रिक टन उर्वरक राज्य में उपलब्ध हैं, जिनमें से 2.89 लाख मीट्रिक टन यूरिया शामिल है। मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सहकारी समितियों और ‘रायथु सेवा केंद्रों (RSKs)’ के माध्यम से उर्वरकों का सुचारु वितरण सुनिश्चित किया जाए।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जैव उर्वरकों को रासायनिक उर्वरकों के साथ अनिवार्य रूप से जोड़कर बेचना प्रतिबंधित है और ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
राज्य सरकार किसानों से अपील कर रही है कि वे स्वेच्छा से अपनी कृषि पद्धतियों में बदलाव लाएं और पर्यावरण के अनुकूल इनपुट अपनाएं, जिससे न केवल फसल की गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ेगा बल्कि भूमि का स्वास्थ्य भी बेहतर होगा। यह पहल आंध्र प्रदेश को हरित और टिकाऊ कृषि की ओर एक मजबूत कदम की ओर ले जाएगी।

