भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर चर्चाएं फिर से रफ्तार पकड़ चुकी हैं। भारतीय वार्ताकारों की एक टीम वाशिंगटन में है और उम्मीद की जा रही है कि अमेरिकी टैरिफ की डेडलाइन (1 अगस्त 2025) से पहले कोई बड़ा ऐलान हो सकता है। लेकिन इस डील की राह में सबसे बड़ी दीवार बना है भारतीय कृषि और खासकर डेयरी सेक्टर।
अमेरिका लगातार मांग कर रहा है कि भारत अपने कृषि बाजार को विशेषकर डेयरी और पोल्ट्री प्रोडक्ट्स के लिए खोले। लेकिन भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि देश के 8 करोड़ किसानों के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
क्या कहती है SBI की रिपोर्ट?
SBI रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत अमेरिकी डेयरी प्रोडक्ट्स के लिए अपने बाजार खोलता है, तो देश के किसानों को करीब ₹1.03 लाख करोड़ का सालाना नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके पीछे प्रमुख कारण होंगे:
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दूध की कीमतों में 15-20% तक गिरावट
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घरेलू सप्लाई चेन पर दबाव
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किसानों की आय पर सीधा प्रभाव
रिपोर्ट के अनुसार भारत का डेयरी सेक्टर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और GVA (सकल मूल्य संवर्धन) में 2.5-3% की हिस्सेदारी रखता है।
किसानों की आजीविका पर मंडरा रहा खतरा
SBI रिपोर्ट का यह भी अनुमान है कि अगर दूध की कीमतों में 15% की गिरावट आती है, तो देश को ₹1.8 लाख करोड़ तक का कुल रेवेन्यू लॉस हो सकता है, जिसमें से 60% का नुकसान सीधे किसानों को भुगतना पड़ेगा। यानी छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका पर सीधा असर।
GTRI की चेतावनी भी अहम
इससे पहले ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने भी चेताया था कि डेयरी, पोल्ट्री, GM सोया और चावल जैसे अमेरिकी उत्पाद, जो भारी सब्सिडी के साथ आते हैं, भारतीय कृषि को बर्बाद कर सकते हैं। इसके चलते खाद्य सुरक्षा भी कमजोर पड़ सकती है।
सरकार का रुख साफ: किसान पहले!
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केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि कोई भी FTA ऐसा होना चाहिए जो दोनों देशों के लिए फायदे का हो।
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कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दो टूक कहा कि सरकार किसी भी दबाव में नहीं आएगी। ट्रेड डील सिर्फ किसानों के हितों को ध्यान में रखकर ही फाइनल होगी।
India-US Trade Deal के दरवाजे भले ही खुल रहे हों, लेकिन भारत के लिए डेयरी सेक्टर एक ‘लाल रेखा’ की तरह है जिसे पार करना शायद नामुमकिन होगा। सरकार स्पष्ट है कि “किसानों की कीमत पर कोई वैश्विक व्यापार समझौता मंजूर नहीं!”

