केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को एक अहम घोषणा करते हुए बताया कि इस वर्ष सरकार द्वारा 18.5 लाख किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। सरकार का यह कदम रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने, मृदा की गुणवत्ता सुधारने और सतत कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है।
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्राकृतिक खेती भारत की परंपरागत कृषि पद्धति है, जो अब फिर से वैज्ञानिक आधार के साथ किसानों के बीच लोकप्रिय हो रही है। उन्होंने बताया कि यह प्रशिक्षण देशभर के विभिन्न राज्यों में कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs), कृषि विश्वविद्यालयों और संबंधित संस्थानों के माध्यम से दिया जाएगा।
प्राकृतिक खेती से होगा बहुस्तरीय लाभ
केंद्रीय मंत्री ने कहा, “प्राकृतिक खेती किसानों की उत्पादन लागत को घटाती है, फसलों की गुणवत्ता बढ़ाती है और मिट्टी तथा जल संसाधनों की रक्षा करती है। इसके ज़रिए हम देश को स्वास्थ्यवर्धक अन्न दे सकते हैं और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भूमि को सुरक्षित रख सकते हैं।”
उन्होंने यह भी बताया कि सरकार गौ आधारित खेती, जीवामृत, बीजामृत और वर्मीकंपोस्ट जैसी विधियों को बढ़ावा दे रही है, जिनमें किसानों को स्थानीय संसाधनों के जरिए खेती करने की तकनीक सिखाई जाएगी।
किसानों को मिलेगा आर्थिक सहयोग
शिवराज सिंह चौहान ने जानकारी दी कि प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण सामग्री, और तकनीकी मार्गदर्शन भी प्रदान किया जाएगा। इसके साथ ही किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के माध्यम से बाजार से जोड़ने की विशेष योजना पर भी काम किया जा रहा है।
सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य
प्राकृतिक खेती के लिए यह प्रशिक्षण कार्यक्रम केंद्र सरकार के “पर्यावरण अनुकूल, लाभकारी और सतत कृषि” के दीर्घकालिक लक्ष्य का हिस्सा है। कृषि मंत्रालय का उद्देश्य है कि आने वाले वर्षों में कम से कम 50 लाख किसान प्राकृतिक खेती की ओर अग्रसर हों।
शिवराज सिंह चौहान ने कहा, “हमारा संकल्प है कि खेती को लाभ का व्यवसाय बनाया जाए। इसके लिए आवश्यक है कि किसान कम लागत में अधिक मुनाफा कमाएं और स्वस्थ पर्यावरण के साथ तालमेल बनाकर उत्पादन करें।” केंद्र सरकार द्वारा घोषित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम न केवल किसानों को एक हरित और लाभदायक विकल्प देगा, बल्कि देश के कृषि परिदृश्य को भी नई दिशा प्रदान करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम खाद्य सुरक्षा, पोषण और जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

