֍:35वीं अखिल भारतीय समन्वित मसाला अनुसंधान परियोजना की बैठक §ֆ:मुख्यातिथि डॉ. एसके सिंह ने बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि मसालों की खेती में नर्सरी से लेकर खेत में उत्पादन के बाद प्रसंस्करण पर और अधिक काम करने की जरूरत है। ताकि मशालों कि खेती को और अधिक लाभकारी बनाया जा सके। उन्होंने कहा कि मसाले वाली फसलों की खेती करके किसान अन्य फसलों के मुकाबले अधिक लाभ कमा सकते है। किसानों को एफपीओ के सहयोग से समूह बनाकर खेती करने के लिए प्रेरित करने कि जरूरत है। जलवायु में हो रहे परिवर्तनों के कारण एग्रो-क्लाइमेट क्षेत्रों के हिसाब से योजना बनाकर उन्नत किस्मों की खेती करने से अधिक लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि उत्पादन में बढ़ोतरी के साथ-साथ मसालों की गुणवत्ता पर भी ध्यान देने की जरूरत है ताकि मसालों के उपयोग से स्वास्थ्य में कोई हानि न हो। आईसीएआर के कोझीकोड और अजमेर में मसालों के राष्ट्रीय स्तर के संस्थान कार्यरत हैं। उन्होंने मसालों की खेती में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को जागरूक करने का भी आह्वान किया। उन्होंने जानकारी सांझा करते हुए कहा कि हाल ही में जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील एवं अधिक उत्पादन देने वाली फसलों की 109 किस्मों का विमोचन किया गया था जिसमें 6 किस्में मसालें वाली फसलों की थी।
§֍:भारत के मसाले विश्व में अपने जायके के लिए प्रसिद्ध: प्रो. बी.आर. काम्बोज §ֆ:विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बीआर कांबोज ने अपने सम्बोधन में कहा कि मसाले न केवल हमारे भोजन में स्वाद और जायका जोड़ते हैं बल्कि हमारे भोजन की गुणवत्ता और औषधीय मूल्यों को भी बढ़ाते हैं। भारत को मसालों और मसाला उत्पादों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक होने के कारण ‘मसालों की भूमि’ के रूप में भी जाना जाता है। भारत के मसाले विश्व में अपने जायके के लिए प्रसिद्ध हैं। अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (आईएसओ) द्वारा सूचीबद्ध 109 मसालों में से, भारत अपने विविध कृषि-जलवायु क्षेत्रों के कारण 63 का उत्पादन करता है। भारत में उगाए जाने वाले कुल 63 मसालों में से 20 को बीज मसालों के रूप में वर्गीकृत किया गया है जिनके सूखे बीज या फलों का उपयोग मसाले के रूप में किया जाता है और वे देश के लगभग 45 प्रतिशत क्षेत्र और कुल मसाला उत्पादन का 18 प्रतिशत हिस्सा योगदान करते हैं। मसाला उद्योग की चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रीय खाद्य और पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए रणनीति तैयार करने के लिए चर्चा होगी, जिसमें उत्पादकता में गिरावट, मिट्टी की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, सूक्ष्मजीव गतिशीलता, जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा चुनौतियां, मसालों में मिलावट की बढ़ती समस्याएं शामिल हैं। मसालों के उत्पादन में बढ़ोतरी करने के लिए आधुनिक तकनीक को अपनाना बहुत जरूरी है। क्लाइमेट चेंज सहित विभिन्न चुनौतिया से निपटने के लिए उन्होंने आपसी तालमेल के साथ कार्य करने पर बल दिया। उन्होंने बताया कि इस तीन दिवसीय बैठक में मसालों से संबंधित आगामी 15 वर्षों का रोड़ मैप बनाया जाएगा। किसानों की आय को दोगुना करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए सफल फसल किस्मों की पहचान करके किसानों के लिए लाभ को बढ़ाने की अनिवार्यता पर जोर देने की आवश्यकता है।§चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में 35वीं अखिल भारतीय समन्वित मसाला अनुसंधान परियोजना की तीन दिवसीय वार्षिक समूह बैठक का शुभारंभ हुआ, जिसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के उप-महानिदेशक (बागवानी) डॉ. एसके सिंह मुख्यातिथि रहे जबकि बैठक की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी.आर. काम्बोज ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में पूर्व उप-महानिदेशक (बागवानी), डॉ. एन कृष्णा कुमार, डॉ. वीए पार्थासारथी व एडीजी डॉ. सुधाकर पांडे उपस्थित रहे। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के सब्जी विज्ञान विभाग और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्- केंद्रीय मसाला अनुसंधान संस्थान, कोझीकोड, कालीकट, केरल द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित की जा रही इस बैठक में देश के विभिन्न राज्यों के 40 अखिल भारतीय कृषि अनुसंधान परियोजना केंद्रों से आए वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं।

