֍:भूमि और जलवायु§ֆ:सिंघाड़े की खेती तालाबों में की जाती है. इस फसल की उन्नत कृषि तकनीक अपनाकर एक-दो फीट पानी से भरे गहराई के खेत में कर सकते हैं. सिंघाड़े की खेती कर धान, सिवनी, आदि के किसान अच्छा मुनाफा कर सकते हैं. इसे बलुई दोमट या दोमट मिट्टी में पी.एच 6.0-7.5 तक उपयुक्त होती है. §֍:सिंघाड़े की उन्नत किस्में§ֆ:सिंघाड़े की कुछ ही किस्में बाजार में मौजूद हैं. इसमें हरीरा गठुआ, लाल गठुआ, कटीला, लाल चिकनी गुलरी, करिया हरीरा, गुलरा हरीरा, गपाचा जैसी किस्में शामिल हैं. ये किस्में रोपाई के 120-150 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती हैं.§֍:ऐसे करें नर्सरी तैयार§ֆ:सिंघाड़े की नर्सरी तैयार करने के लिए पके फलों का बीज चयन कर जनवरी के समय में पानी में डुबाकर रखा जाता है. अंकुरण होने के बाद ये एक सप्ताह बाद गहरे तालाब या पानी में डाल दिए जाते हैं. जिसके बाद मार्च में फलों से बेल निकलने लगती है. इसकी रोपणी करने के लिए प्रति हेक्टेयर 300 किलोग्राम सुपर फॉस्फेट, 60 किलोग्राम पोटाश या 20 किलोग्राम यूरिया तालाब में उपयोग कर सकते हैं. §֍:तुड़ाई§ֆ:सिंघाड़े की पकने वाली प्रजातियों की पहली तुड़ाई अक्टूबर के पहले हफ्ते में शुरु हो जाती है और ये नवंबर के पहले हफ्ते से लेकर जनवरी तक चलती है. इन फसलों में चार तुड़ाई की जाती है. बता दें, पके फलों की तुड़ाई करने चाहिए, कच्चे फलों की तुड़ाई करने पर गोटी छोटी बनती है. §֍:सिंघाड़े के कीट§ֆ:सिंघाड़े में सिंघाड़ा भृंग, लाल खजूरा कीट 25 – 40 प्रतिशत तक उत्पादन कम कर सकता है. इसी के साथ नीला भृंग, माहू एवं घुन कीट का प्रकोप भी पाया गया है. इसकी फसल में लोहिया, दहिया रोग का प्रकोप होता है. अगर ये रोग फसल में लग जाएं तो फसल छोटी और कमजोर मिलती है.§भारत में अक्टूबर से ही सिंघाड़े की आवक शुरु हो जाती है. सिंघाड़ा एक तालाबों में पैदा होने वाली एक नगदी फसल है. देशभर में सिंघाड़े की काफी डिमां है, जिस वजह से ये किसानों के लिए एक फायदे का सौदा बन जाती है. इसकी सब्जी, आटा और कच्चा भी खाया जाता है. इसमें प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, पोटेशियम, मैगनीज, जिंक के साथ कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं.

