֍:पोटोमैक हॉर्स फीवर§ֆ:इस बीमारी को घोड़ों में जनवरी की शुरुआत से लेकर जुलाई तक देखा जाता है. PHF एक ऐसी बीमारी है जिसमें घोड़े को हल्का शूल, बुखार और दस्त पैदा होता है. साथ ही गर्भवती घोड़ियों में गर्भपात भी होता है. इसके लक्षण में बुखार, अवसाद, आंतों की आवाज में कमी, दस्त और हल्का शूल है. अगर आपके घोड़े को भी ये बीमारी हो गई है तो आप सबसे पहले अपने पशु को पशु चिकित्सक के पास लेकर जाएं. पशु चिकित्सक के पास जाते समय अपने साथ घोड़े के रक्त या गोबर के नमूने ले जाएं, जिससे की डॉक्टर को बीमारी पहचानने में आसानी हो सके. इसकी रोकथाम के लिए आप चिकित्सक से टीके लगवा सकते हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक इस बीमारी को रोका नहीं जा सकता, लेकिन अगर घोड़ा जीवाणु के संपर्क में आता है तो वे इसकी गंभीरता को कम कर सकते हैं. §֍:
इक्विन हर्पीसवायरस
§ֆ:घोड़ों में की सालों से इक्विन हर्पीसवायरस की समस्या देखी जा रही है. इस बीमारी की विशेषता श्वसन संक्रमण, पक्षाघात, गर्भपात, रीढ़ की हड्डी की सूजन और कभी-कभी युवा घोड़ों में मृत्यु है. ये ऐसी संक्रमित बीमारी है, जो नाक के स्राव, संक्रमित घोड़ों के संपर्क, दूषित चारा और पानी के बर्तनों से फैलता है. इस बीमारी की रोकथाम के लिए आप टीकाकरण करा सकते हैं. साथ ही जब भी आप नया जानवर लाएं तो उसे पहले झुंड से अलग कर उसे अच्छी तरह साफ करें, जिसके बाद उसको पशु चिकित्सक के पास ले जाकर जरूरी टीकाकरण कराएं. बाद में चेकअप कराने के बाद ही पसु को झुंड में शामिल करें.§֍:घोड़ा इन्फ्लूएंजा§ֆ:घोड़ों में सांस की बीमारियां भी हो जाती है. इसमें उन्हें बहुत ते फ्ली हो जाता है. इसके लक्षण तेज बुखार, अचानक तेज, सूखी खांसी, नाक से स्राव निकलना, सुस्ती आना और भूख में कमी है. इस बीमारी की रोकथाम के लिए आप घोड़ों को कम से कम 14 दिनों के लिए उनको दूसरे पशु से दूर करें. बाद में बीमारी के टीके उन्हें लगवाएं. इससे घोड़े को काफी आराम मिल जाएगा और वह 2-3 दिनों में ठीक होता दिखने लगेगा. अगर घोड़े में कोई सुधार नहीं दिखता है, तो उसे तुरंत पशु चिकित्सक के पास लेकर जाएं.§֍:टेटनस §ֆ:टेटनस एक बैक्टीरियल बीमारी है, जो कि मिट्टी, खाद, आदि के शरीर पर लगने से हो सकता है. पशु चिकित्सक बताते हैं कि ये बीमारी 50-75% मामलों में घातक साबित होती है. इस बीमारी का पता लगाने के लिए आप गोड़े में मांशपेशियों में अकड़न, चलने में कठनाई, पसीन आना, आदि के लक्षण देख सकते हैं. इस बीमारी की रोकथाम के लिए आप घोड़े को सबसे पहले बाकी पशुओं से अलग करें और उसे स्वच्छ पानी दें और साफ पानी से साफ करे दें. इसके बाद उसे सूखी-साफ जगह पर बैठाएं और हरा चारा चोकर में मिलाकर खिलाएं. इससे घोड़े को काफी अच्छा महसूस होगा. अगर हो सके तो उसके सामने हवा ज्यादा आने दें, इसके लिए आप पशु के सामने पंखा भी रख सकते हैं. कुछ दिनों तक अगल और साफ रखने के बाद वह ठीक होने लग जाएगा. अगर ऐसा नहीं होता तो इसको गंभीरता से लें और तुरंत पशु को पशु चिकित्सक के पास ले जाएं. §भारत में किसान काफी समय से पशु पालन करते आ रहे हैं, इसमें मुर्गी पालन, बकरी पालन, घोड़ापालन, गाय पालन, आदि शामिल है. पशु पालकों को घोड़े पालने का काफी शौक होता है. क्योंकि घोड़े पालना पहले के जमाने में काफी रॉयल बात मानी जाती थी. घोड़े लगभग हर जगह पर सफर कर सकते हैं, लेकिन उन्हें बीमारी काफी तेजी से लग जाती है, ऐसे में जल्द ही बीमारी को लेकर कोई रोकथाम नहीं की गई तो घोड़े की मृत्यु भी हो सकती है.

