ֆ:इस तथ्यि को ध्या न में रखते हुए, भाकृअनुप – केन्द्री य आलू अनुसंधान संस्था न (ICAR-CPRI), शिमला ने ऊतक संवर्धन और सूक्ष्म प्रवर्धन प्रौद्योगिकियों पर आधारित अनेक हाईटेक बीज उत्पािदन प्रणालियों का मानकीकरण किया है। बीज उत्पाौदन की इन प्रणालियों को अपनाने से प्रजनक बीज की गुणवत्ता् में सुधार आएगा, बीज गुणनीकरण दर बढ़ेगी और कम से कम 2 वर्ष तक बीज फसल के खेत प्रकटन में कमी आएगी। इस प्रौद्योगिकी को किसानों और अन्य़ हितधारकों तक पहुंचाने से पहले भाकृअनुप – केन्द्री य आलू अनुसंधान संस्थाीन (ICAR-CPRI), शिमला के बीज उत्पा दन फार्म पर इनका व्याापक परीक्षण किया गया था। संस्थाून द्वारा विकसित हाईटेक बीज उत्पाेदन प्रणालियों को अपनाने से देशभर में 20 से भी अधिक ऊतक संवर्धन उत्पारदन इकाइयों के खुलने का मार्ग प्रशस्तअ हुआ। अनेक सरकारी/निजी बीज उत्पा दन करने वाले संगठन प्रतिवर्ष भाकृअनुप – केन्द्री य आलू अनुसंधान संस्थाीन (ICAR-CPRI), शिमला से प्रमुख अधिसूचित और जारी की गई आलू किस्मों के वायरस मुक्तस स्वि: पात्रे मातृ संवर्धन खरीदते हैं ताकि उनके हाईटेक बीज उत्पा दन कार्यक्रमों में उनका पुन: गुणनीकरण किया जा सके।
§ֆ:संस्थाफन द्वारा मानकीकृत की गई नवीनतम हाईटेक बीज उत्पािदन प्रणाली मृदारहित, ऐरोपॉनिक तकनीक की अवधारणा पर आधारित है। बीज उत्पाीदन की ऐरोपॉनिक प्रणाली में संस्थादन द्वारा ‘बीज प्लॉकट तकनीक’ की शुरूआत करने के लगभग 50 वर्ष बाद आलू बीज सेक्टवर में एक बार पुन: क्रान्ति लाने की क्षमता है। ऐरोपॉनिक प्रणाली को वर्ष 2011 में सटीक रूप से उपयुक्तू किया गया और अभी उत्त र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पंजाब और हरियाणा जैसे विभिन्नब राज्योंा से 14 फर्मों को इसका व्या वसायीकरण किया गया है। प्रत्येलक फर्म को ऐरोपॉनिक प्रणाली के माध्यबम से 10 लाख लघुकंद उत्प न्ना करने का लाइसेंस दिया गया है। यहां तक कि यदि प्रत्येकक फर्म अपनी क्षमता से आधे स्तुर तक भी कार्य कर रही है, तब भी इन फर्मों द्वारा वर्तमान में लगभग 6.5 मिलियन लघुकंद उत्पतन्नत किए जा रहे हैं।
§ֆ:भाकृअनुप – केन्द्री य आलू अनुसंधान संस्थाकन (ICAR-CPRI), शिमला द्वारा आलू की 25 लोकप्रिय किस्मोंप का ~ 3,187 मीट्रिक टन केन्द्रिक एवं प्रजनक बीज उत्पाPदन किया जाता है जिसमें से 70 प्रतिशत का उत्पादन पारम्प रिक प्रणाली से और 30 प्रतिशत का उत्पापदन हाईटेक प्रणाली के माध्यशम से किया जाता है। फार्म भूमि की सीमा के कारण भाकृअनुप – केन्द्री य आलू अनुसंधान संस्थातन (ICAR-CPRI), शिमला के फार्म पर प्रजनक बीज उत्पा्दन की मात्रा में वृद्धि करने का सीमित स्कोथप है इसलिए राज्य। कृषि विश्वशविद्यालयों/कृषि विज्ञान केन्द्रों /निजी किसानों की मदद से इसकी संभावनाओं को तलाशा जा रहा है ताकि बीज उत्पावदन के नए क्षेत्रों की पहचान की जा सके, समझौता ज्ञापन के तहत प्रजनक बीज का एफएस-1, एफएस-2 तथा प्रमाणित बीज में गुणनीकरण किया जा सके और उद्यमियों/निजी कम्पपनियों की मदद से हाईटेक प्रणालियों द्वारा बीज उत्पाणदन किया जा सके।
§शाकीय रूप से प्रवर्धित फसलों में गुणवत्ताक रोपण सामग्री की उपलब्धीता हमेशा से सीमित रही है। सर्वाधिक शाकीय प्रवर्धित फसल होने के कारण आलू की फसल में बड़ी संख्याप में बीजजनित रोग होते हैं जो कि उपज में कमी के लिए उत्तारदायी होते हैं। इसलिए, यह जरूरी है कि आलू के टिकाऊ और किफायती उत्पापदन के लिए अच्छी गुणवत्ता। वाले स्व स्थ बीज का उपयोग किया जाए। गुणवत्ताे आलू बीज उत्पा्दन के लिए पिछले पांच दशकों से भारत में ”बीज प्लॉट तकनीक” पर आधारित पारम्पजरिक बीज उत्पाेदन प्रौद्योगिकी का सफलतापूर्वक इस्तेेमाल किया जा रहा है। इसमें प्रजनक बीज उत्पातदन के लिए चार चक्रों में वायरस मुक्तफ मातृ कंदों का क्लोलनल गुणनीकरण और सभी प्रमुख वायरस के लिए कंदीय सूचीकरण शामिल है। भाकृअनुप – केन्द्री य आलू अनुसंधान संस्थाीन (ICAR-CPRI), शिमला द्वारा उत्पकन्न– प्रजनक बीज की आपूर्ति विभिन्नस राज्यर सरकार के संगठनों को पुन: गुणनीकरण के लिए की जाती है जिसे कड़े स्वाास्य्नक मानकों के तहत तीन चक्रों यथा आधारीय बीज 1 (FS-1), आधारीय बीज 2 (FS-2) और प्रमाणित बीज (CS) में किया जाता है। हालांकि, राज्यक सरकारों द्वारा प्रजनक बीज गुणनीकरण की वर्तमान स्थिति वांछित बीज गुणनीकरण श्रृंखला के अनुसार नहीं है और भाकृअनुप – केन्द्री य आलू अनुसंधान संस्थांन (ICAR-CPRI), शिमला द्वारा आपूर्ति किए गए प्रजनक बीज का गुणनीकरण प्राय: केवल आधारीय बीज – 1 (FS-1) अवस्था तक ही किया जा रहा है। इसके परिणामस्वणरूप, देश में प्रमाणित बीज की काफी कमी बनी हुई है। देश में गुणवत्तार बीज आलू की भारी मांग को पूरा करने का केवल एक ही तरीका है और वह है प्रगत वायरस खोज तकनीकों के साथ जुड़कर हाईटेक बीज उत्पाेदन प्रणाली को शामिल करना।

