5 अगस्त को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में आई अचानक आपदा ने धराली (Dharali) की सुकून भरी वादियों को मौत के सन्नाटे में बदल दिया। जो जगह कभी पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए शांति का केंद्र थी, आज वहाँ सिर्फ मलबे के ढेर, दरकती पहाड़ियों के पत्थर और कीचड़ से भरे दलदल नजर आते हैं। होटल्स जमींदोज हो चुके हैं, घरों की नींवें धंस गई हैं, और लोगों के सपने गाद में दफन हो गए हैं 3।
प्रकृति का कहर: कुछ पलों में तबाह हुई जिंदगियाँ
आपदा ने इतनी तेजी से वार किया कि लोगों को संभलने का मौका भी नहीं मिला। स्थानीय निवासी बताते हैं कि पहाड़ी नदियों का पानी अचानक उफान पर आ गया, जिससे भूस्खलन और बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। मलबे के नीचे दबे लोगों की सही संख्या अभी तक अंदाज़ा नहीं लगाई जा सकी है। “यहाँ हर कदम पर मौत का सन्नाटा है। मलबे के नीचे से कभी चीखें सुनाई देती हैं, तो कभी सिर्फ खामोशी…”, एक रेस्क्यू टीम के सदस्य ने बताया।
बचाव अभियान में जुटी तमाम एजेंसियाँ
हादसे के बाद भारतीय सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, बीआरओ, अग्निशमन विभाग और स्थानीय प्रशासन ने संयुक्त रूप से राहत कार्य शुरू किया है। हालांकि, लगातार जारी भूस्खलन और बारिश के कारण बचाव कार्य में बाधाएँ आ रही हैं। मेडिकल टीमें घायलों को निकालने और उन्हें तुरंत इलाज मुहैया कराने में जुटी हैं, लेकिन दुर्गम इलाकों तक पहुँचना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
उत्तराखंड और यूपी की सीमा पर भी बाढ़ का खतरा
इस आपदा के साथ ही उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे मैदानी इलाकों में भी पहाड़ी नदियों के उफान पर आने से बाढ़ की आशंका बढ़ गई है 3। प्रयागराज में गंगा और यमुना का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है, जिससे नए संकट की आशंका जताई जा रही है 11।
अब क्या? सवाल ज्यों के त्यों
धराली की त्रासदी ने एक बार फिर प्रकृति के सामने इंसानी बसावटों की नाजुकता को उजागर कर दिया है। सरकार ने मुआवजे और पुनर्वास का आश्वासन दिया है, लेकिन स्थानीय लोगों का सवाल है: “क्या ऐसी आपदाओं से बचाव के लिए कोई स्थायी व्यवस्था होगी?” जवाब अभी तक अनसुना है…

