भारत के डिजिटल कृषि इकोसिस्टम में आज एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज हुई है। जम्मू-कश्मीर से 11 मीट्रिक टन सेब और नाशपाती लेकर एक ट्रक पुणे स्थित गुलटेकड़ी एपीएमसी मंडी पहुँचा। यह राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) प्लेटफॉर्म के तहत पहला अंतरराज्यीय व्यापार है, जो देश की कृषि मंडियों के डिजिटल एकीकरण में मील का पत्थर साबित हो रहा है।
व्यापार का यह सफर क्यों है खास?
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ऐतिहासिक पहल: कश्मीर घाटी से महाराष्ट्र तक सीधे व्यापार का यह पहला सफल प्रयास ई-नाम के “एक राष्ट्र, एक बाजार” के विजन को साकार करता है।
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महाराष्ट्र की अगुआई: राज्य ने 133 कृषि मंडियों को ई-नाम से जोड़कर डिजिटल अपनाने वाले अग्रणी राज्यों में अपनी भूमिका पक्की की है। महाराष्ट्र राज्य कृषि विपणन बोर्ड के संयुक्त निदेशक विनायक कोकरे के अनुसार, “इससे किसानों को बेहतर कीमत, गुणवत्ता आश्वासन और पारदर्शी लेनदेन मिलेगा” ।
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हितधारकों को लाभ: व्यापारी सुयोग झेंडे (जिनके साथ यह सौदा हुआ) ने इसे “क्रांतिकारी कदम” बताया। उन्होंने बताया कि इससे किसानों को पूरे भारत में सरकारी सत्यापित खरीदार मिलेंगे, जबकि व्यापारियों का यात्रा खर्च और समय बचेगा।
ई-नाम कैसे बदल रहा है कृषि बाजारों का नक्शा?
केंद्र सरकार के इस प्रमुख प्लेटफॉर्म ने हाल ही में कई उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं:
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राष्ट्रीय पैमाने पर कनेक्टिविटी: देश की 1,522 मंडियाँ अब ई-नाम से जुड़ चुकी हैं, जहाँ 1.78 करोड़ किसान और 4,518 एफपीओ पंजीकृत हैं। अब तक ₹4.39 लाख करोड़ मूल्य की कृषि उपज का व्यापार हो चुका है।
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डिजिटल सुविधाएँ:
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पारदर्शी कीमतों और गुणवत्ता जांच की ऑनलाइन सुविधा।
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एफपीओ ट्रेड मॉड्यूल और लॉजिस्टिक्स सेवाएँ जैसे नए उन्नयन, जिनसे COVID-19 के दौरान व्यापार निर्बाध रहा ।
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राज्यों की भागीदारी: जम्मू-कश्मीर की 17 मंडियाँ इस नेटवर्क का हिस्सा हैं, जो अब राष्ट्रीय बाजार तक पहुँच बना रही हैं।
क्यों है यह व्यापार भविष्य का आईना?
इस सफल लेनदेन के बाद, ई-नाम के जरिए अंतर-राज्य व्यापार को बढ़ावा देने की रणनीति तेज होगी। किसान अब पारंपरिक बिचौलियों और भौगोलिक सीमाओं से मुक्त होकर सीधे राष्ट्रीय खरीदारों से जुड़ सकेंगे 38। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह डिजिटल परिवर्तन किसान आय दोगुनी करने के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

