भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ता पाँच दौर की बातचीत के बाद ठप हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50% टैरिफ लगाने के बाद उन्होंने साफ़ कर दिया कि जब तक टैरिफ का मामला सुलझ नहीं जाता, तब तक आगे कोई वार्ता नहीं होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्पष्ट किया है कि वह किसानों, डेयरी और मछुआरों के हितों से समझौता नहीं करेंगे, चाहे इसके लिए उन्हें राजनीतिक या आर्थिक कीमत क्यों न चुकानी पड़े।
कृषि और डेयरी पर सबसे बड़ा टकराव
वार्ता में सबसे बड़ा विवाद कृषि, डेयरी और मत्स्य पालन क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियों को प्रवेश देने को लेकर है। अमेरिका चाहता है कि भारत मक्का, सोयाबीन, सेब, कपास, बादाम, इथेनॉल और कई अन्य कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम करे और आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) मक्का, सोया, कैनोला और कपास को भारतीय बाजार में आने दे। साथ ही, अमेरिकी डेयरी आयात को मंजूरी देने की भी मांग की जा रही है।
भारत इन मांगों को मानने के लिए तैयार नहीं है। कारण यह है कि सस्ते अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पाद भारतीय बाजार में बाढ़ ला सकते हैं, जिससे घरेलू कीमतें गिरेंगी और छोटे किसानों को भारी नुकसान होगा। भारतीय डेयरी पर अमेरिकी चारे की पद्धतियों को लेकर सांस्कृतिक और आहार संबंधी आपत्तियां भी हैं, क्योंकि अमेरिका में मवेशियों को अक्सर पशु-आधारित उत्पाद खिलाए जाते हैं।
‘हमारे किसान बनाम आपके किसान’
मूल रूप से यह टकराव दोनों देशों के किसानों के हितों को लेकर है। अमेरिका अपने किसानों को, जो वहां एक मजबूत राजनीतिक गुट हैं, अधिक बाज़ार पहुँच दिलाना चाहता है। दूसरी ओर, भारत अपने किसानों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना चाहता है।
अमेरिका के मिडवेस्ट जैसे कृषि प्रधान क्षेत्रों में किसान ट्रंप के महत्वपूर्ण समर्थक हैं। 2016 और 2020 के चुनावों में कृषि-आधारित काउंटियों में औसतन 77% से अधिक वोट ट्रंप को मिले। ऐसे में उनकी व्यापार नीति में कृषि और डेयरी क्षेत्रों को प्राथमिकता मिलना स्वाभाविक है। अमेरिकी किसान बड़े पैमाने पर उत्पादन करते हैं और घरेलू खपत की सीमाओं के कारण निर्यात पर अत्यधिक निर्भर हैं।
भारत में भी किसान सबसे शक्तिशाली मतदाता समूहों में से एक हैं। कृषि और इससे जुड़े क्षेत्र भले ही भारत की 3.9 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में लगभग 16% योगदान देते हों, लेकिन ये देश की आधी आबादी का भरण-पोषण करते हैं। छोटे और सीमांत किसानों के हितों की रक्षा भारतीय राजनीति में संवेदनशील मुद्दा है। चार साल पहले कृषि कानूनों के विरोध ने सरकार को पीछे हटने पर मजबूर किया था, इसलिए कृषि क्षेत्र में किसी भी बड़े विदेशी प्रवेश को लेकर सरकार सतर्क है।
संरचना का बड़ा अंतर
भारतीय और अमेरिकी कृषि संरचना में जमीन–आसमान का फर्क है। अमेरिका में औसत खेत का आकार 187 हेक्टेयर है, जबकि भारत में यह केवल 1.08 हेक्टेयर है। डेयरी में भी यही स्थिति है — भारत में प्रति किसान औसतन 2–3 पशु हैं, जबकि अमेरिका में एक फार्म में सैकड़ों मवेशी होते हैं। यह असमानता भारतीय किसानों को सीधे प्रतिस्पर्धा में कमजोर बना देती है।
अमेरिका का दबाव और भारत की सीमाएँ
अमेरिका चाहता है कि भारत डेयरी, पोल्ट्री, मक्का, सोयाबीन, गेहूँ, चावल, इथेनॉल, खट्टे फल, बादाम, पेकान, सेब, अंगूर, डिब्बाबंद आड़ू, चॉकलेट, कुकीज़ और फ्रोजन फ्रेंच फ्राइज जैसी वस्तुओं के लिए अपने बाज़ार खोले। भारत केवल कुछ उत्पादों — जैसे अमेरिकी सूखे मेवे और सेब — पर अधिक पहुँच देने को तैयार है, लेकिन संवेदनशील फसलें और डेयरी उत्पाद सूची से बाहर रख रहा है।
जीएम फसलों पर भारत का रुख कड़ा है, जबकि अमेरिका का अधिकांश मक्का और सोयाबीन उत्पादन जीएम आधारित है। भारत के लिए यह सिर्फ़ एक व्यापारिक मुद्दा नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय चिंताओं का मामला भी है।
राजनीतिक निहितार्थ
ट्रंप प्रशासन के लिए अमेरिकी किसानों के हित साधना एक राजनीतिक रणनीति भी है। कृषि लॉबी का समर्थन बनाए रखने के लिए अमेरिका विदेशों में नए बाजार ढूँढ रहा है। भारत जैसा विशाल उपभोक्ता बाजार इसके लिए आदर्श है।
भारत के लिए यह मुद्दा घरेलू राजनीतिक दबाव से जुड़ा है। विपक्ष सस्ते आयात की संभावना को किसानों के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत कर सकता है, जिससे सरकार की राजनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है। साथ ही, अगर भारत अमेरिका को रियायत देता है, तो अन्य व्यापारिक साझेदार भी समान लाभ की मांग कर सकते हैं।
नतीजा: गतिरोध बरकरार
इस समय वार्ता की संभावना धुंधली है। अमेरिका टैरिफ और बाजार पहुँच के मुद्दे पर सख्त है, जबकि भारत किसानों की सुरक्षा, सांस्कृतिक मान्यताओं और आर्थिक स्वायत्तता पर समझौता करने को तैयार नहीं।
यह गतिरोध केवल व्यापार संतुलन का मामला नहीं, बल्कि दो अलग-अलग कृषि अर्थव्यवस्थाओं और राजनीतिक संरचनाओं के टकराव का नतीजा है। अमेरिका के लिए यह अपने कृषि निर्यात और राजनीतिक समर्थन को बनाए रखने का सवाल है, जबकि भारत के लिए यह अपने किसानों की जीविका, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिरता का मामला है।

