पूर्वोत्तर भारत में बांस किसानों और कारीगरों को लाभ पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त प्रयासों के तहत कई अहम योजनाएं शुरू की गई हैं। इन प्रयासों में बांस की खेती, बांस आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना, उत्पादों का मूल्य संवर्धन, विपणन और उपयुक्त मूल्य सुनिश्चित करना शामिल है।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, राष्ट्रीय बांस मिशन (NBM) राज्य सरकारों के प्रयासों को सहयोग प्रदान करते हुए बांस मूल्य श्रृंखला को विकसित करने में सहायता करता है। इसका उद्देश्य बांस उत्पादकों को कारीगरों और उपभोक्ताओं से जोड़ना है, जिससे स्थानीय किसानों को सीधा लाभ मिल सके। विशेष रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र में इस योजना का व्यापक प्रभाव देखने को मिल रहा है। मिशन के अंतर्गत बांस बाज़ार, खुदरा विक्रय केंद्रों जैसे बुनियादी ढांचे के विकास के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र को सहायता दी जा रही है।
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने बांस मैट बोर्ड, पैनल, तरंगित चादरें, कम्पोजिट्स आदि जैसे बांस उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कई मानक तय किए हैं, ताकि ये उत्पाद घरेलू उपयोग के साथ-साथ निर्यात के लिए भी उपयुक्त बन सकें।
उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय (DoNER) ने बांस उत्पादों के मानकों को पूरा करने के लिए विभिन्न हितधारकों और संभावित भागीदारों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया है, जिससे बांस किसानों और कारीगरों को वैश्विक मानकों पर तैयार किया जा सके।
इसके साथ ही, गृह निर्माण और शहरी मामलों के मंत्रालय ने नवाचार आधारित बांस सामग्री के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए अपने अधीनस्थ संस्थानों को प्रोत्साहित किया है। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) ने अपनी दर अनुसूची और विनिर्देशों में इंजीनियर्ड बांस उत्पादों को शामिल किया है। उल्लेखनीय है कि 2017 में CPWD की दिल्ली दर अनुसूची में “बांस वुड” कंपोजिट सामग्री को शामिल किया गया था।
हाल ही में, असम राज्य सरकार की कैबिनेट ने एक बड़ा निर्णय लेते हुए, सार्वजनिक निर्माण विभाग की दर सूची में इंजीनियर्ड बांस कंपोजिट सामग्री को शामिल किया है, और नए सार्वजनिक भवनों के निर्माण में कम से कम 5% बांस सामग्री का उपयोग अनिवार्य कर दिया है। यह पहल न केवल स्थानीय उत्पादकों के लिए आर्थिक अवसर उत्पन्न करेगी, बल्कि सतत निर्माण को भी बढ़ावा देगी।

