कर्नाटक में इस बार अच्छी बारिश ने किसानों की उम्मीदों को पंख दे दिए हैं। कई जिलों में समय से पहले बुआई शुरू हो गई है, जिससे मक्का जैसी प्रमुख फसलों की खेती में जबरदस्त इजाफा देखने को मिल रहा है। राज्य में मक्का की बुआई इस बार लगभग 2 लाख हेक्टेयर तक बढ़ी है। लेकिन इस अच्छी शुरुआत को खाद संकट ने चुनौती दे दी है।
DAP और यूरिया की भारी कमी से किसानों की परेशानी बढ़ी
मक्का की फसल को अधिक मात्रा में DAP और यूरिया की जरूरत होती है। लेकिन राज्य के विभिन्न हिस्सों में इन उर्वरकों की भारी कमी देखी जा रही है। कृषि विभाग और खुद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने केंद्र सरकार से कई बार खाद आपूर्ति बढ़ाने की अपील की, लेकिन पर्याप्त जवाब नहीं मिला।
कितनी मांग, कितनी आपूर्ति?
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DAP की मांग (अप्रैल-जुलाई): 3.03 लाख मीट्रिक टन
DAP की आपूर्ति: 2.21 लाख मीट्रिक टन -
यूरिया की मांग: 6.8 लाख मीट्रिक टन
यूरिया की आपूर्ति: 5.35 लाख मीट्रिक टन -
कुल मांग: 12.95 लाख मीट्रिक टन
मंजूरी मिली: 11.17 लाख मीट्रिक टन
राज्य बनाम केंद्र: किसकी जिम्मेदारी?
राज्य सरकार का कहना है कि उसने केंद्र को छह बार पत्र भेजे और हर सप्ताह वीडियो कॉन्फ्रेंस के ज़रिए खाद आपूर्ति की मांग की। मुख्यमंत्री ने भी निजी तौर पर पत्र लिखकर DAP और यूरिया की जरूरत जताई।
वहीं केंद्र सरकार का तर्क है कि मानसून से पहले उसके पास सीमित स्टॉक था, इसलिए सभी राज्यों को संतुलित मात्रा में ही खाद दी गई।
भाजपा का आरोप: बजट में की गई कटौती
भाजपा नेता एन. रविकुमार ने राज्य सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस सरकार ने खाद के लिए बजट घटा दिया है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा सरकार के समय ₹1,000 करोड़ का बजट था, जिसे अब घटाकर ₹400 करोड़ कर दिया गया है।
रविकुमार ने यह भी आरोप लगाया कि किसानों को घटिया गुणवत्ता के बीज और खाद दिए जा रहे हैं, जिससे उनकी फसलें खराब हो रही हैं।
किसानों के लिए समाधान ज़रूरी
राज्य और केंद्र सरकार के बीच चल रही तनातनी का सबसे बड़ा नुकसान किसानों को हो रहा है। अगर समय पर खाद और बीज नहीं मिले, तो फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कृषि को राजनीति से ऊपर रखते हुए, सभी पक्षों को मिलकर समस्या का समाधान खोजना होगा।

