पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) ने राज्य के धान उत्पादक किसानों को 2025 के खरीफ सीजन के दौरान धान की बौनी बीमारी (Rice Dwarfing Disease) को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी है। यह बीमारी साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रिक्ड ड्वार्फ वायरस (SRBSDV) के कारण होती है, जो धान की फसल के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
2022 में कई जिलों को हुआ था भारी नुकसान
इस वायरस के कारण 2022 के खरीफ मौसम में फतेहगढ़ साहिब, पटियाला, होशियारपुर, लुधियाना, पठानकोट, एसएएस नगर और गुरदासपुर जैसे जिलों में धान की फसल को व्यापक नुकसान हुआ था। संक्रमित पौधों की ऊंचाई सामान्य के मुकाबले आधी या एक-तिहाई तक रह जाती है। इन पौधों की पत्तियां संकरी और सीधी हो जाती हैं, जड़ और तने का विकास रुक जाता है और कई बार पौधे समय से पहले सूख जाते हैं, जिससे भारी पैदावार हानि होती है।
लक्षण दिखते ही तुरंत जानकारी दें
पौध रोग विभाग के प्रमुख डॉ. पी.एस. संधू ने बताया कि फिलहाल राज्य की नर्सरियों में इस वायरस का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन स्थिति पर वैज्ञानिकों की पूरी निगरानी बनी हुई है। उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि यदि किसी खेत में बौनी बीमारी के लक्षण नजर आएं, तो तुरंत नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या PAU के विशेषज्ञों से संपर्क करें।
व्हाइटबैक्ड प्लांटहॉपर से फैलता है वायरस
धान की इस बीमारी को फैलाने में व्हाइटबैक्ड प्लांटहॉपर (WBPH) नामक कीट की अहम भूमिका है, जो पंजाब की धान-गेहूं फसल प्रणाली में सामान्यतः पाया जाता है। PAU के प्रमुख कीट वैज्ञानिक डॉ. के.एस. सूरी ने किसानों को सलाह दी कि वे सप्ताह में कम से कम एक बार खेतों का निरीक्षण करें। पौधों को झुकाकर हल्के से थपथपाने पर अगर कीट पानी की सतह पर दिखाई दें, तो उनके नियंत्रण के लिए तुरंत कार्रवाई करें।
इन कीटनाशकों का करें सीमित उपयोग
WBPH की रोकथाम के लिए PAU ने निम्नलिखित कीटनाशकों की सिफारिश की है:
- पेक्सालॉन 10 SC (triflumezopyrim): 94 मि.ली./एकड़
- उलाला 50 WG (flonicamid): 60 ग्राम/एकड़
- ओशीन/डॉमिनेंट/टोकन 20 SG (dinotefuran): 80 ग्राम/एकड़
- इमैजिन 10 SC / वायोला 10 SC (fluprimin): 300 मि.ली./एकड़
- ऑर्केस्ट्रा 10 SC (benzpyrimoxan): 400 मि.ली./एकड़
- चेस 50 WG (pymetrozine): 120 ग्राम/100 लीटर पानी/एकड़
स्प्रे करते समय फ्लैट-फैन या खोखली कोन नोजल का प्रयोग करते हुए दवा को पौधों के आधार पर केंद्रित करें।
हालांकि, डॉ. सूरी ने किसानों को चेताया कि कीटनाशकों का बिना आवश्यकता और अत्यधिक प्रयोग न करें, क्योंकि इससे कीट प्रतिरोधक क्षमता बढ़ सकती है और पर्यावरण व जैव विविधता को नुकसान हो सकता है।
जिंक की कमी से भी हो सकते हैं समान लक्षण
PAU के विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. एम.एस. भुल्लर ने बताया कि कई बार जिंक की कमी के कारण भी पौधों में बौनी वृद्धि और कम कल्ले निकलने जैसी समस्याएं होती हैं, जिससे गलत पहचान की संभावना होती है। इसलिए किसानों को किसी भी समस्या की सही पहचान और समाधान के लिए कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेने की अपील की गई है।
PAU पूरी तरह सतर्क
PAU के अनुसंधान निदेशक डॉ. ए.एस. धत्त ने किसानों को भरोसा दिलाया कि विश्वविद्यालय के पास इस वायरस की त्वरित और सटीक पहचान की पूरी क्षमता है। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक धान के साथ-साथ खरपतवार और वैकल्पिक पोषक पौधों पर भी निगरानी कर रहे हैं, जो इस वायरस को फैलाने में भूमिका निभा सकते हैं।
डॉ. धत्त ने किसानों से अपील की कि वे PAU द्वारा जारी नवीनतम कृषि सलाहों और बुलेटिन्स को नियमित रूप से पढ़ें और उन पर अमल करें ताकि समय पर उचित कदम उठाए जा सकें।
सावधानी और जागरूकता ही बचाव है, यह संदेश देते हुए PAU ने राज्य के किसानों से अपील की है कि वे 2025 के धान सीजन के दौरान पूरी सतर्कता बरतें और किसी भी समस्या के लिए विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त करें।

