• डॉ. एम. एस. राव, चेयरमैन, बायो एग्री नेक्स्ट आयोजन समिति एवं पूर्व प्रधान वैज्ञानिक, आईसीएआर-आईआईएचआर, बैंगलोर
• डॉ. अजय रांका, को-चेयर, आयोजन समिति एवं चेयरमैन एवं एमडी, ज़ायडेक्स इंडस्ट्रीज़
• डॉ. सी. के. टिंबाडिया, कुलपति, गुजरात नेचुरल फार्मिंग साइंस यूनिवर्सिटी
• पी. डी. पालसाना, अतिरिक्त सचिव, कृषि विभाग, गुजरात सरकार
• विपिन सैनी, सीईओ, BASAI Agri
• अमित खरे, संस्थापक, स्नेल इंटीग्रल प्रा. लि.
इसके अलावा, दीपक शाह, संदीपा कानिटकर , मनोज वार्ष्णेय, शन्मुगम सम्बन्थन, डॉ. मुकेश पटेल, अमित कुमार सिंह एवं मनोज कुमार रूपा जैसे कई प्रमुख वक्ताओं ने इस आयोजन को विचारों से समृद्ध किया।
§֍:परंपरा से तकनीक तक: नवाचार के साथ आत्मनिर्भरता की ओर§ֆ:सम्मेलन का प्रमुख विषय “परंपरागत ज्ञान से वैज्ञानिक प्रमाणन तक” रहा, जिसके तहत भारतीय पारंपरिक कृषि विधियों को वैज्ञानिक नवाचारों के साथ जोड़ने पर जोर दिया गया।
डॉ. अजय रांका ने कहा – “क्या प्राकृतिक खेती और जैविक नवाचार एक साथ चल सकते हैं?” उन्होंने बताया कि मल्चिंग और जैविक मिट्टी प्रबंधन जैसी परंपरागत विधियों को अब बायो-डाइजेस्टर्स और माइक्रोबियल समाधानों जैसी तकनीकों से और प्रभावी बनाया जा रहा है।
डॉ. टिंबाडिया ने प्राकृतिक खेती में वपासा, मल्चिंग और शून्य जुताई जैसी पारंपरिक विधियों का उल्लेख किया और बताया कि इन्हें बायो-स्टिमुलेंट्स, माइक्रोबियल कॉन्सॉर्शिया और गोबर गैस सिस्टम जैसी आधुनिक तकनीकों से कैसे और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
पी. डी. पालसाना ने कहा कि प्राकृतिक खेती न केवल मिट्टी की सेहत बहाल करती है बल्कि जैव विविधता को बढ़ावा देती है और किसानों के रासायनिक लागतों को भी कम करती है।
कोमल शाह भुखनवाला ने जैव उर्वरकों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ये उर्वरक मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों को सक्रिय करते हैं, पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाते हैं और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करते हैं।
§۩:Uploads/NewsImages/21-07-2025/HZGa3IQiHeJqY2sx4fqQ.jpg|§֍:नवाचार से टिकाऊ खेती और लाभदायकता का मेल§ֆ:सम्मेलन के दौरान वक्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि टिकाऊ खेती केवल पर्यावरण हितैषी नहीं बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभदायक है।
मनोज कुमार रूपा ने बायो-रेजिलिएंट समाधानों जैसे बायोस्टिमुलेंट्स, बायोफर्टिलाइजर्स और बायोपेस्टीसाइड्स की चर्चा की और बताया कि ये किसान को जलवायु-अनुकूल, लागत-कम और रासायन-मुक्त खेती के लिए सशक्त बनाते हैं।
मनोज वार्ष्णेय ने कहा, “अधिक उगाओ, सुरक्षित उगाओ, सस्ते में उगाओ, पर्यावरण के लिए उगाओ।” उन्होंने बताया कि बायोफर्टिलाइजर्स व बायोस्टिमुलेंट्स खेती को टिकाऊ बनाने के साथ-साथ उपज भी बढ़ाते हैं।
शन्मुगम सम्बन्थन ने बताया कि जैविक समाधानों के ज़रिए किसान कार्बन क्रेडिट जैसे वैकल्पिक आय स्रोतों का लाभ उठा सकते हैं, जिससे खेती ना केवल टिकाऊ बल्कि लाभदायक भी हो सकती है।
डॉ. जिगर मिस्त्री ने बताया कि कंपोस्टिंग, कवर क्रॉपिंग और रासायनिक इनपुट को घटाकर ना सिर्फ पर्यावरणीय लाभ होते हैं बल्कि कार्बन क्रेडिट मार्केट में भागीदारी से आर्थिक स्थिरता भी मिलती है।
§۩:Uploads/NewsImages/21-07-2025/hfTCP3I9NAv4PqbOyPAd.jpg|§֍:जैविक कृषि: जलवायु संकट का समाधान§ֆ:राजकुमार अग्रवाल, संस्थापक और एमडी, रे कंसल्टिंग, ने जैविक इनपुट्स के माध्यम से कार्बन उत्सर्जन घटाने और मिट्टी के स्वास्थ्य को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
योगेश मोहिते ने बताया कि बायोफर्टिलाइजर, बायोपेस्टीसाइड, जैविक फंगीसाइड और कम्पोस्ट जैसे इनपुट्स मिट्टी में कार्बन को संचित करने में मदद करते हैं और जलवायु-लचीला कृषि तंत्र तैयार करते हैं।
सुहास जोशी द्वारा संचालित चौथे पैनल डिस्कशन में विशेषज्ञों ने बायो एग्रीकल्चर के ज़रिए जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीतियों, कार्बन क्रेडिट प्रणाली, नीति सहयोग और वैज्ञानिक नवाचारों पर चर्चा की।
§۩:Uploads/NewsImages/21-07-2025/tlbKn5Uw9AgvIamTxG5q.jpg|§֍:अल्गा एनर्जी की भागीदारी: माइक्रोएल्गी से टिकाऊ भविष्य§ֆ:अल्गा एनर्जी के एशिया पैसिफिक प्रेसिडेंट देबब्रत सरकार ने “इनोवेटिव एंड सस्टेनेबल सॉल्यूशंस” विषय पर सत्र को संबोधित किया। उन्होंने माइक्रोएल्गी-आधारित तकनीकों और नेक्स्ट-जेन बायोलॉजिकल इनपुट्स की भूमिका पर विस्तार से बात की जो कृषि को पुनर्योजी और जलवायु-स्थायी बना सकते हैं।§۩:Uploads/NewsImages/21-07-2025/0OUZvukZUW1LLvOVWIUn.jpg|§֍:नीतिगत सुझाव: सरकार को दी गई महत्वपूर्ण सिफारिशें§ֆ:सम्मेलन के अंत में नीति निर्माताओं और सरकार को निम्नलिखित प्रमुख सुझाव प्रस्तुत किए गए:
1. जैविक कृषि के लिए राष्ट्रीय टास्क फोर्स का गठन किया जाए।
2. बायोलॉजिकल इनपुट्स को अलग श्रेणी में मान्यता मिले और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी हों।
3. प्राकृतिक खेती को वैज्ञानिक जैव नवाचारों के साथ एकीकृत किया जाए।
4. सार्वजनिक-निजी शोध सहयोग को बढ़ावा दिया जाए।
5. किसानों के लिए जागरूकता और सब्सिडी कार्यक्रम शुरू किए जाएं।
§֍:भविष्य की खेती – परंपरा से विज्ञान की ओर§ֆ:बायो एग्री नेक्स्ट 2025 ने यह साबित कर दिया कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक जैविक तकनीकें मिलकर भारतीय कृषि को न केवल आत्मनिर्भर बना सकती हैं, बल्कि उसे वैश्विक नेतृत्व की ओर ले जा सकती हैं।
आयोजनकर्ता स्नेल इंटीग्रल प्रा. लि. और इसके संस्थापक अमित खरे को इस प्रभावशाली सम्मेलन के सफल संचालन के लिए भरपूर सराहना मिली। यह आयोजन केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि एक हरित और पुनर्योजी कृषि भविष्य की दिशा में ठोस पहल थी।
§
गुजरात की राजधानी अहमदाबाद स्थित हयात रीजेंसी होटल में बायो एग्री नेक्स्ट ग्लोबल कॉन्फ्रेंस एंड एक्सपो 2025 का भव्य आयोजन हुआ, जिसने टिकाऊ और जैविक कृषि की दिशा में एक नया अध्याय जोड़ा। इस दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन स्नेल इंटीग्रल प्राइवेट लिमिटेड द्वारा किया गया, जो जैविक कृषि को प्रोत्साहित करने वाले विचारों, नवाचारों और नीतियों के समागम का केंद्र बन गया।
कार्यक्रम का उद्घाटन पूर्व केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री परषोत्तम रूपाला जी ने मुख्य अतिथि के रूप में किया। अपने उद्घाटन भाषण में उन्होंने पारंपरिक भारतीय कृषि ज्ञान को आधुनिक जैविक नवाचारों के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा:
“भारतीय कृषि को अपने पारंपरिक ज्ञान के साथ आधुनिक जैविक नवाचारों का समावेश करना होगा। भविष्य वही है जहाँ खेती लाभदायक हो, अवशेष रहित हो और वैश्विक स्तर पर सम्मानित हो।”

