वर्तमान समय में किसानों के लिए खेती को लाभकारी बनाने के लिए वैज्ञानिक जानकारी और सही मार्गदर्शन की अत्यंत आवश्यकता है। फसल क्रांति लगातार प्रयासरत है कि कृषि विशेषज्ञों की सलाह और अनुभव को किसानों तक सीधे पहुंचाया जाए। इसी दिशा में, फसल क्रांति ने भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लाडोवाल (लुधियाना) के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं कृषि विशेषज्ञ डॉ. शंकर लाल जाट से विशेष बातचीत की।
भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान किसानों के लिए किस प्रकार कार्य कर रहा है?
मैं पिछले 15 वर्षों से इस संस्थान से जुड़ा हूं और हम निरंतर मक्का पर अनुसंधान और विकास कार्य कर रहे हैं। 10 वर्ष पहले तक मक्का मुख्यतः एक खाद्यान्न फसल के रूप में जानी जाती थी, लेकिन आज यह एक प्रमुख औद्योगिक और नकदी फसल बन चुकी है।
मौजूदा समय में मक्का का केवल 10% हिस्सा खाद्य उपयोग में आता है जबकि 90% औद्योगिक उपयोग, जैसे कि स्टार्च, पशु चारा और इथेनॉल उत्पादन में किया जाता है। यह देश की तीसरी सबसे अधिक उत्पादित फसल बन चुकी है।
इस वर्ष मक्का उत्पादन का अनुमान लगभग 42 मिलियन टन है, जो पिछले वर्ष के 38 मिलियन टन से अधिक है। केंद्र सरकार द्वारा NCCF और NAFED के माध्यम से मक्का की खरीद की घोषणा की गई है। साथ ही, बायो-इथेनॉल नीति के तहत इससे निर्मित सफेद पेट्रोल को सामान्य पेट्रोल में मिलाया जाता है, जिससे इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
क्या गन्ना किसान मक्का की खेती को अपनाने पर विचार कर सकते हैं?
बिल्कुल। उत्तर प्रदेश जैसे गन्ना प्रधान राज्यों में मक्का की इंटरक्रॉपिंग (मिश्रित फसल प्रणाली) अपनाना किसानों के लिए लाभकारी हो सकता है। गन्ने की फसल की शुरुआती तीन महीनों में जब उसकी वृद्धि धीमी रहती है, उस दौरान मक्का की बुवाई की जा सकती है।
हमने किसानों के साथ कई डेमो किए हैं और उनका अनुभव सकारात्मक रहा है। इससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिलती है और गन्ने की वृद्धि पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
हमने इस संबंध में एक नारा भी दिया है: “मक्का बढ़ा रही है मिठास गन्ने की”।
इंटरक्रॉपिंग के माध्यम से किसानों को मक्का का कितना उत्पादन मिल सकता है?
यदि किसान फरवरी में गन्ने की बुवाई करते हैं, तो गन्ने के साथ मक्का की इंटरक्रॉपिंग करके वे प्रति एकड़ 35 से 40 क्विंटल मक्का का उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
सबसे अहम बात यह है कि खरपतवार नियंत्रण के लिए अलग से लागत नहीं आती, क्योंकि जो दवाइयाँ गन्ने में लगती हैं, वही मक्का पर भी असरकारी होती हैं। साथ ही, मक्का लगभग 100 दिनों में तैयार हो जाती है, जिसके बाद किसान उसे काट सकते हैं और गन्ने की फसल आगे बढ़ती रहती है। यह मॉडल उत्पादन और लाभ दोनों दृष्टिकोण से सफल सिद्ध हो रहा है।
मक्का की खेती को बढ़ावा देने के लिए संस्थान क्या प्रयास कर रहा है?
हमने देशभर के 100 से अधिक जिलों में ‘कैचमेंट एरिया डेवलपमेंट‘ के तहत मक्का को बढ़ावा दिया है। इथेनॉल उत्पादन के लिए लगभग 150 इकाइयाँ स्थापित की गई हैं ताकि स्थानीय स्तर पर मक्का से इथेनॉल तैयार किया जा सके और परिवहन लागत कम हो।
मुरादाबाद और मुज़फ्फरनगर जैसे क्षेत्रों में किसानों को मक्का की खेती के लिए प्रशिक्षित किया गया है। कई किसानों ने चावल की तुलना में मक्का को अधिक लाभकारी पाया है।
बायो-इथेनॉल नीति आने के बाद मक्का की मांग न केवल घरेलू उद्योगों में बढ़ी है, बल्कि इसका निर्यात भी एक बड़ा अवसर बन चुका है।
किसानों को मक्का की कौन-कौन सी किस्में लगानी चाहिए?
किस्म का चयन फसल के मौसम और अवधि के अनुसार करना चाहिए। वर्षा ऋतु के लिए निम्नलिखित प्रमुख किस्में हैं:
- DHM 206
- PMH 11
- PMH 14
- DHM 117
- IMH 224
- BMRH 1308
यदि किसान कम अवधि वाली फसल लेना चाहते हैं तो LKMH 1 एक उपयुक्त किस्म है, जो 100 दिन से कम में तैयार हो जाती है।
ये सभी किस्में रोग और कीट प्रतिरोधी हैं और उच्च उत्पादन क्षमता रखती हैं। बीज हमारे भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लाडोवाल (लुधियाना) में उपलब्ध हैं, साथ ही किसान प्रमाणित कंपनियों से भी उच्च गुणवत्ता वाले बीज प्राप्त कर सकते हैं।
मक्का की बुवाई का सही समय क्या है?
मक्का की बुवाई का समय और तरीका दोनों बहुत अहम होते हैं। यदि किसान के पास सिंचाई सुविधा है और मानसून आने वाला है, तो बारिश से लगभग 15 दिन पहले बुवाई करना उपयुक्त होता है। इससे खरपतवार कम होते हैं और पौध स्वस्थ रहती है। जून से 10 जुलाई तक सामान्य किस्मों की बुवाई की जा सकती है, जबकि अगस्त में कम अवधि वाली किस्में बोई जा सकती हैं। भारत में मक्का की बुवाई और कटाई लगभग सालभर चलती रहती है, इसलिए किसानों को सही फसल चक्र की जानकारी होनी अत्यंत आवश्यक है।
किसानों को मक्का की खेती क्यों करनी चाहिए?
मक्का एक बहुउपयोगी और उच्च उत्पादन वाली नकदी फसल है। इसमें चावल की तुलना में उत्पादन क्षमता अधिक है। साथ ही, इथेनॉल नीति आने के बाद इसके औद्योगिक उपयोग में तेज़ी से वृद्धि हुई है। किसान मक्का से न केवल घरेलू बाज़ार में लाभ कमा सकते हैं, बल्कि निर्यात के ज़रिए भी आमदनी बढ़ा सकते हैं। वैज्ञानिक पद्धति और सही किस्मों का चयन करके मक्का एक अत्यंत लाभकारी फसल साबित हो सकती है।
यदि किसान मक्का की किस्मों या बीजों के बारे में जानकारी लेना चाहें, तो वह कैसे संपर्क करें?
जो भी किसान मक्का की खेती में रुचि रखते हैं, वे भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लाडोवाल (लुधियाना) से सीधे संपर्क कर सकते हैं। संस्थान में प्रमाणित संकर किस्मों के बीज उपलब्ध हैं और किसानों को वैज्ञानिक मार्गदर्शन भी दिया जाता है।
हमारी टीम हर स्तर पर किसानों के साथ काम करती है ताकि वे अधिक लाभदायक और टिकाऊ खेती की ओर बढ़ सकें।

