भारत सरकार के मत्स्य पालन मंत्रालय के अधीन पशुपालन और डेयरी विभाग (DAHD) द्वारा विज्ञान भवन, नई दिल्ली में “भारत के पशुपालन क्षेत्र के आधुनिकीकरण और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन” पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला “तकनीक और नवाचार के माध्यम से कृषि, बागवानी, डेयरी, मत्स्य और प्रसंस्करण को रूपांतरित करने” की थीम पर आधारित रही और यह मुख्य सचिवों के चौथे सम्मेलन के तहत छह विभागीय सम्मेलनों का हिस्सा रही।
कार्यशाला की अध्यक्षता पशुपालन और डेयरी विभाग की सचिव अल्का उपाध्याय ने की। इस महत्वपूर्ण आयोजन में केंद्र और राज्य सरकारों के प्रतिनिधि, नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड, विभिन्न दुग्ध संघों और पशुपालन क्षेत्र के प्रमुख हितधारकों ने भाग लिया। इसका उद्देश्य पशुपालन क्षेत्र का आधुनिकीकरण, उत्पादन में वृद्धि और गुणवत्ता आधारित विकास को प्रोत्साहन देना रहा।
अल्का उपाध्याय ने अपने मुख्य संबोधन में बताया कि पशुपालन भारत में एक बड़ा नकद आय सृजक क्षेत्र है, जो देश के कुल कृषि सकल मूल्य वर्धन (GVA) में 30.7% का योगदान देता है। उन्होंने नवाचार, गुणवत्ता सुधार और राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर सशक्त सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में और अधिक किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) का गठन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने जमीनी स्तर की चुनौतियों का भी उल्लेख करते हुए भरोसा दिलाया कि विभाग वैश्विक मानकों के अनुरूप एक आधुनिक और मजबूत पशुपालन तंत्र विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
अतिरिक्त सचिव (डेयरी विकास), वर्षा जोशी ने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए विभाग की थीम की संकल्पना प्रस्तुत की। उन्होंने पशुधन क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण चारे की आवश्यकता और गुणवत्ता उत्पादन सुनिश्चित करने की चुनौती को रेखांकित किया। उन्होंने दूध, अंडा और मांस उत्पादन में भारत की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए बताया कि पशुपालन में देश की स्थिति लगातार सशक्त हो रही है। उन्होंने विशेष रूप से प्रजनन, रोग निगरानी और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में आधुनिकीकरण की आवश्यकता जताई।
कार्यशाला के क्षेत्रीय सत्रों में राज्यों की भागीदारी
इस कार्यशाला को चार क्षेत्रीय सत्रों में विभाजित किया गया, जिनमें भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया:
- उत्तर क्षेत्र: जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश
- पश्चिम क्षेत्र: गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा, राजस्थान
- दक्षिण क्षेत्र: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, अंडमान-निकोबार, पुदुचेरी
- पूर्व और पूर्वोत्तर क्षेत्र: अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, बिहार
प्रत्येक सत्र में राज्यों ने क्षेत्र विशेष की चुनौतियों और अवसरों पर विचार-विमर्श किया। चर्चा के प्रमुख बिंदु रहे: उत्पादकता में वृद्धि, रोग नियंत्रण, और टिकाऊ पशुधन प्रथाओं को बढ़ावा देना।
सत्र का समापन और आगे की रणनीति
समापन सत्र में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्राप्त सुझावों को एकत्र कर एक संयुक्त कार्य योजना का खाका तैयार किया गया। प्रतिनिधियों ने सहमति जताई कि पारस्परिक सहयोग से पशुपालन क्षेत्र में ठोस सुधार संभव है। इसमें तकनीक के व्यापक प्रयोग, क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार योजनाएं बनाने और स्थानीय स्तर पर कार्यान्वयन की दिशा में ठोस पहल की जाएगी।

