पंजाब से असम और आंध्र से अरुणाचल तक, भारत के किसान अब गेहूं-धान की पारंपरिक जोड़ी को छोड़कर ‘लाल सोना’ यानी पाम ऑयल की खेती की तरफ रुख कर रहे हैं। वजह? मुनाफा चौगुना, मेहनत आधी और बाजार की गारंटी पक्की जैस है। पाम ऑयल के बढ़ते बाजार को देखते हुए केंद्र सरकार भी किसानों को इसकी खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
क्या है पाम ऑयल और क्यों मचा है इसका शोर?
पाम ऑयल एक ऐसा खाद्य तेल है जो ताड़ के पेड़ के फलों से निकलता है और आज यह बिस्किट से लेकर बायोफ्यूल तक हर जगह इस्तेमाल हो रहा है। दुनिया में सबसे ज्यादा खपत वाले इस तेल को भारत हर साल 80,000 करोड़ रुपये खर्च कर आयात करता है।
भारत में कहां हो रही है खेती?
पाम ऑयल की खेती के लिए जिन राज्यों को चुना गया है, वहां जलवायु अनुकूल है। इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, त्रिपुरा, नागालैंड, असम, केरल, तमिलनाडु और अरुणाचल प्रदेश शामिल है। यहां किसानों को सब्सिडी, तकनीकी सहायता और गारंटीड बाजार के साथ आकर्षित किया जा रहा है।
“खेती कम, कमाई ज्यादा” — जानिए कैसे?
| मापदंड | पाम ऑयल | परंपरागत तिलहन |
|---|---|---|
| उत्पादन प्रति हेक्टेयर | 4-5 टन तेल | 0.5-1 टन |
| कमाई (वार्षिक) | ₹1.5-2 लाख/हेक्टेयर | ₹40-60 हजार |
| उत्पादन अवधि | 30 साल तक | 3-4 महीने |
पाम ऑयल को लेकर कृषि विशेज्ञय की मानें तो, ड्रिप सिंचाई और सहकारी मॉडलों के साथ ये खेती अगली पीढ़ी के किसानों के लिए वरदान साबित होगी।
सरकारी प्लानिंग और पावरफुल सपोर्ट
सरकार ने 2021 में “राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन – तेल हथेली” (NMEO-OP) लॉन्च किया, जिसमें लक्ष्य है कि 2026 तक देश में 10 लाख हेक्टेयर भूमि पर पाम ऑयल की खेती हो।
साथ ही सब्सिडी बेनिफिट्स की बात करें तो…..
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पौधारोपण पर 100% सब्सिडी
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ड्रिप सिंचाई पर 50-80% सब्सिडी
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प्रोसेसिंग यूनिट्स को भी आर्थिक मदद
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बायबैक एग्रीमेंट से किसानों को फिक्स खरीदार

