केला सिर्फ एक स्वादिष्ट फल ही नहीं, बल्कि किसानों के लिए साल भर आय का भरोसेमंद जरिया भी है। इसमें पाए जाने वाले विटामिन, मिनरल्स और चिकित्सीय गुण इसे बाजार में हमेशा माँग में बनाए रखते हैं। वहीं, बारिश के मौसम में जून–जुलाई के बीच नर्सरी से खेत तक का सफर तय करने वाला यह पौधा अच्छी उत्पादन क्षमता का प्रस्ताव देता है।
कौन से राज्य हैं टॉप प्रोड्यूसर?
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, भारत में सबसे अधिक केला उत्पादन महाराष्ट्र में होता है—पूरा देश का 17.28% हिस्सा सिर्फ यहीं से आता है। दूसरे स्थान पर 15.42% हिस्सेदारी के साथ आंध्र प्रदेश, तीसरे पर तमिलनाडु (12.32%), चौथे पर उत्तर प्रदेश (11.09%), पांचवें पर गुजरात (10.41%) और छठे नबंर पर कर्नाटक (8.27%) है। ये छह राज्य मिलकर देश के कुल केले उत्पादन का लगभग 75% भाग रखते हैं।
टिशू कल्चर: तेजी से लाभ का मॉडर्न रास्ता
परंपरागत तरीके से पौधे तैयार होने में लगभग 8–10 महीने लगते हैं, लेकिन टिशू कल्चर विधि से तैयार नर्सरी पौधे मात्र 6–7 महीने में उपज देना शुरू कर देते हैं। सटीक तापमान नियंत्रण और पोषक तत्वों से लैस इस तकनीक के तहत, 45×45 सेमी गड्ढों में 10 किलो जैविक खाद, 250 ग्राम खली और 20 ग्राम कार्बोफ्यूरान मिलाकर पौधरोपण किया जाता है। इससे युवा पौधा तेज़ी से जड़ पकड़ता है और कटाई में समय की बचत होती है।
सिंचाई सुविधा वाले क्षेत्र में साल भर खेती संभव
जहाँ सिंचाई की समुचित व्यवस्था है, वहाँ बनियान बेरी जैसे संयंत्रों से ली गई जानकारी के अनुसार केला पूरे साल फल देने में सक्षम होता है। इससे किसान मानसून-बाधित ज़मीन पर भी नियमित आमदनी सुनिश्चित कर सकते हैं।

