ֆ:विशेषज्ञों ने बताया कि बीते कई दशकों से नाइट्रोजनयुक्त रसायनिक खादों, खासकर सब्सिडी वाले यूरिया के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग ने भारत की मिट्टी की उर्वरता को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसके कारण माइक्रोन्यूट्रिएंट की भारी कमी, जल प्रदूषण, और ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि जैसे गंभीर पर्यावरणीय संकट पैदा हो गए हैं।बैठक में यह भी उजागर किया गया कि भारत सरकार द्वारा हर वर्ष 22 अरब डॉलर से अधिक की सब्सिडी दिए जाने के बावजूद, केवल 35–40% ही यूरिया फसलों द्वारा उपयोग किया जाता है, जबकि शेष मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित कर रहा है।
§ֆ:विशेषज्ञों ने चेताया कि मिट्टी की खराब गुणवत्ता का सीधा असर मानव पोषण पर भी पड़ रहा है। उदाहरणस्वरूप, जिंक की कमी वाली मिट्टी बच्चों में बौनेपन (stunting) की एक प्रमुख वजह बनती है, जो देश की भावी पीढ़ी और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है।एक विशेषज्ञ ने मिट्टी की मौजूदा स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हुए कहा, “भारत की मिट्टी अब आईसीयू (ICU) में है”, और इसे बचाने के लिए तत्काल बहु-क्षेत्रीय, संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है।
§ֆ:बैठक का निष्कर्ष था कि मिट्टी की सेहत सुधारना न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाने बल्कि देश की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। विशेषज्ञों ने टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने, रासायनिक खादों की निर्भरता कम करने और किसानों को जागरूक करने की दिशा में ठोस नीतिगत कदम उठाने की सिफारिश की।
§राजधानी दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर स्थित कैसुएरिना हॉल में सोमवार को आयोजित उच्चस्तरीय राउंड टेबल बैठक में देश के प्रमुख वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और कृषि उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने भारतीय कृषि में अत्यधिक यूरिया उपयोग पर गंभीर चिंता जताई।
बैठक का आयोजन इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) के एग्रीकल्चर पॉलिसी, सस्टेनेबिलिटी एंड इनोवेशन (APSI) डिवीजन द्वारा किया गया था। इसका विषय था – “बेहतर फसल और मानव पोषण के लिए मिट्टी की सेहत में सुधार”।

